बिहार में महिलाओं के लिए धीमी है विकास की गति: कब बदलेगी बिहार में महिला सशक्तीकरण की स्थिति?
| Updated: Aug 26, 2021 | Category: Blog

बिहार में महिलाओं के लिए धीमी है विकास की गति: कब बदलेगी बिहार में महिला सशक्तीकरण की स्थिति?

महिलाएँ हमारे समाज का आधा हिस्सा हैं। फिलहाल यह बात सिर्फ उपदेश और नारों में ही इस्तेमाल की जाती है। हमारे समाज में महिला पुरुष बराबरी के लिए अभी भी बहुत बदलाव की आवश्यकता है। महिलाओं के लिए हम महिला सशक्तीकरण दिवस मनाते है। जिसमे हम महिलाओं द्वारा किए गए त्याग और बलिदान की बात करते है। अक्सर सोशल मीडिया पर हम महिलाओं की उपलब्धि और उनके बलिदानों के बारे में हजारों शब्दों के लेख लिख देते हैं पर क्या हकीकत में महिला और पुरुष का समान स्थान है। हालांकि देश में अब महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। दूसरे राज्यों सहित बिहार में महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए योजनाए शुरू की जा रहीं है।  लेकिन सरकार के इतने प्रयासों के बावजूद बिहार में महिला सशक्तीकरण की स्थिति में कुछ ख़ास सुधार नहीं आया है। 

महिलाओं को समाज में समान स्थान देने और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक कई तरह की घोषणाएं करती हैं, लेकिन हमारे देश में महिलाओं की क्या स्थिति है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि आज भी भारत के कई जिलों में अधिकतर महिलाओं का जीवन घर की चार दीवारों तक ही सीमित रह जाता है। इन जिलों में बिहार भी शामिल है यहां लगभग 95 प्रतिशत महिलाएँ बेरोजगार है। बिहार में नौकरी करने वाली महिलाओं की संख्या अन्य राज्यों के मुकाबले काफी कम हैं। 

बिहार में छात्राओं की शिक्षा पूरी होने से पहले ही उनकी शादी करा दी जाती है। और कुछ महिलाएँ पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उनके परिवार वाले नौकरी करने की अनुमति नहीं देते है। अभिभावकों को मानना है की प्राइवेट कंपनी में पुरुष कर्मचारी ज्यादा होते है ऐसे में महिलाएँ उनमे सुरक्षित नहीं रह पाएंगी। 

बिहार में पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी अपने हक के लिए कुछ नहीं कर पाती और ना चाहते हुए भी उन्हें अपने आत्मनिर्भर और सशक्त बनने के सपनों को तोडना पड़ता है और ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिसके वो विरूद्ध हैं।

बदलते समय के साथ परंपराएं बदल रही हैं, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य भी बदल रहे हैं। बिहार में बदलती पीढ़ियों के प्रभाव से नए दृष्टिकोण और नए मूल्य स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन यहां महिलाओं की स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आए हैं। ऐसा लगता है जैसे बिहार में महिलाओं के विकास की गति बहुत धीमी हो गई है।

बदलती सरकारें और बदलते दौर के बावजूद महिलाओं के प्रति हिंसा के मामले बेहद शर्मनाक हैं। लिंगभेद, बाल विवाह, परंपरागत व्यवहार मानने के लिए मजबूर करना, घरेलू हिंसा, गैर बराबरी, शिक्षा से वंचित रखना, छेड़छाड़, बलात्कार, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या, संतान न होने, बेटा न होने पर प्रताड़ना जैसे अमानवीय व्यवहार का महिलाओं को आज भी सामना करना पड़ता है। 

इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात तो यह है कि आज भी हमारा समाज इन अमानवीय व्यवहारों को सामान्य मानते हैं। यह आज की ही बात नहीं है बल्कि हमारे इतिहास से भी पता चलता है की महिलाओ को कभी भी पुरुषों के समान अधिकार मिला ही नहीं। ऐसे में बिहार में महिला सशक्तीकरण केवल एक कल्पना मात्र है। 

मध्यकालीन युग में महिलाओं की दशा थी बेहद दयनीय

बिहार में मध्यकालीन युग में महिलाओं की दशा बेहद ही दयनीय हो चली थी। उस समय समाज में पर्दा प्रथा थी, पुरुष समाज महिलाओं को पर्दों में और घर की चारदीवारों में ही देखना पसंद करते थे। मध्यकालीन युग में महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, कुलीन विवाह, शिक्षा और रोजगार के लिए स्वतंत्रता नहीं थी। आज़ादी के 70 दशक बाद भी महिलाओं की स्थिति अभी कुछ मामलों में वैसी ही है जैसी आज़ादी के पहले थी। आज़ादी के पहले भी महिलाओं को आर्थिक निर्भरता, शिक्षा की कमी, रोजगार पर पाबंदियां, संयुक्त परिवार प्रणाली, बहुपत्नी प्रथा और दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं का सामना करना पड़ता था।  हालांकि इन 70 दशकों में थोड़े बहुत बदलाव हुए हैं इसे नकारा नहीं जा सकता लेकिन दहेज़ प्रथा, शिक्षा की कमी और रोजगार पर पाबंदी जैसी समस्याएं आज भी हैं। 

बिहार में महिला सशक्तीकरण: पुरुष प्रधान देश में पुरुषों का अहम 

पुरुष अपने पुरुषत्व को कायम रख महिलाओं को हमेशा अपने से कम होने का अहसास दिलाता आया है। वह कभी उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी उस पर हाथ उठाता है। समय बदल जाने के बाद भी पुरुष आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना पसंद नहीं करते, उनकी मानसिकता आज भी पहले जैसी ही है।  

दुर्भाग्य की बात है कि बिहार में महिला सशक्तीकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएँ शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र, नई सोच वाली, ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएँ हैं, तो वही दूसरी तरफ गांव की चारदीवार में सभी यातनाओं को सहते हुए अपना जीवनयापन करने वाली महिलाएँ हैं। 

महिलाओं के प्रति पुरुषों के ऐसे बर्ताव के पीछे कारण यह नहीं कि महिलाएँ पुरुषों के समान सक्षम नहीं हैं, या फिर बिना किसी पुरुष की सहायता के वो अपना जीवन व्यतीत नहीं कर सकतीं। बल्कि पुरुष महिलाओं के साथ ऐसा दोयम दर्जे का व्यवहार करके अपने अहम को संतुष्ट कर लेना चाहते हैं।

चुनाव में जीत के लिए राजनीतिक पार्टियां खेलती हैं महिला कार्ड 

सरकारें चुनाव के समय महिला कार्ड खेलने से नहीं चुकती। बिहार के पिछले चार चुनावों की बात करें तो महिलाओं वोटरों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले दो दशक में हुए चार विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान करीब 17 फीसदी बढ़ा है। पिछले दो चुनावों से तो मतदान प्रतिशत में महिलाओं ने लगातार पुरुषों को पछाड़ रखा हैं। महिला वोटरों की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है और अब महिला वोटरों पर ही कई राजनीति पार्टियों की हार जीत निर्भर करती है। ऐसे में बहुत जरुरी हो जाता है की राज्य की महिलाओं के हक़ में कार्य किए जाए और उनसे वोट पाने के लिए पहले उनके विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए। हालांकि इसमें कोई दोराह नहीं की सरकार ने बिहार में महिला सशक्तीकरण और उनके उत्थान के लिए अनेक महत्वपूर्ण काम किए हैं जैसे की दहेज़ प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या पर रोक, समान शिक्षा का अधिकार और महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए योजनाएं भी जारी की हैं। इसके अलावा अधिकतर महिलाओं की गुहार पर सरकार ने नशाबंदी के लिए भी कड़े कदम उठाए।  

नशाबंदी महिला वोटरों को खुश करने की दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक कठिन कदम था। क्योंकि 2016 में नशाबंदी की घोषणा के बाद राज्य के आय स्त्रोत में भारी कमी आई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह नुकसान लगभग 5,500 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष है। 

 इसके अलावा सरकार द्वारा पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया और सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत।  

बिहार में बाल विवाह कुप्रथा है बच्चियों के लिए घातक 

बिहार में आज भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा सांस ले रही है। दरअसल आज भी बिहार में कई जगहों पर लड़कियों का बचपन में या 18 साल पूरे होने से पहले ही विवाह करा दिया जाता है। बिहार में आज भी ऐसे बहुत से मामले देखने को मिलते हैं जहां परिवार वाले अपनी बेटियों का विवाह 18 वर्ष से पहले करा देते हैं। वे अपनी बेटियों की पढ़ाई बीच में ही रोक देते है उनका मानना होता है की लड़कियां पढ़ के क्या करेंगी भविष्य में उन्हें केवल घर ही संभालना है। इसी मानसिकता के साथ उनके सपने और भविष्य की परवाह किए बिना परिवार वाले उनकी पढ़ाई बीच में ही रोककर उनका विवाह कर देते हैं। 

बिहार में महिला सशक्तीकरण: छात्राओं की शिक्षा में चुनौतियाँ 

आज के समय में महिलाओं की स्थिति, विकास और उनके सशक्तीकरण का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद जिस तरह हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण, रोजगार के क्षेत्र में वृद्धि हो रही है, उसके मुकाबले महिलाओं की स्थिति उतनी संतोषजनक नहीं है। हालांकि कुछ समय से हमारे देश में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति में सुधार आया है, बावजूद इसके साक्षरता का दर आज नहीं पुरुषों की तुलना में काफी कम है।  

बिहार में भी बाकी कई पिछड़े राज्यों की तरह लड़कियों की शिक्षा को महत्ता नहीं दी जाती। लड़कियों को केवल घर ही संभालना है इसी सोच के साथ उनके हाथों से किताबें छीनकर उन्हें घर के काम पर लगा दिया जाता है। 

 हालांकि बदलते समय के साथ कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो अपनी लड़की को पढ़ाना चाहते हैं और वे इसी उद्देश्य से उन्हें स्कूल भी भेजते हैं। लेकिन कई बार स्कूल गावों और कस्बों से दूर होने के कारण उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। और उनकी सुरक्षा का ख़याल रखते हुए ना चाहते हुए भी अभिभावकों को अपनी बच्ची की पढ़ाई रोकनी पड़ती है। 

 इसके अलावा गावों और कस्बों में एकाध जो सरकारी स्कूल मौजूद हैं वहां भी लड़कियों के लिए बाथरूम की सुविधा उपलब्ध नहीं होती और स्कूल प्रशासन उन्हें बाहर जाने की हिदायत देने है, जो की उनकी सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। ये भी एक कारण है जिससे अभिभावक और खुद छात्रा भी स्कूल नहीं जाना चाहते। 

करियर के बीच पारिवारिक दबाव हैं सबसे बड़ा रोड़ा

लड़कियों के करियर के बीच पारिवारिक दबाव सबसे बड़ा रोड़ा है। बिहार की लगभग 90% लड़कियों के साथ पारिवारिक समस्या होती है। उन्हें 12वीं कक्षा पास करते है शादी का फरमान सुना दिया जाता है।  लड़कियों से उनके भविष्य या सपनों के बारे में नहीं पूछा जाता कि वह आगे क्या करना चाहती हैं, और क्या बनना चाहती हैं। कुछ छात्राओं ने बताया कि यहां सबसे बड़ी समस्या लोगों की मानसिकता है। लोग ये सोचते हैं कि लड़की तो सिर्फ घर के काम ही करेगी, घरपर रहना चाहिए, शादी के बाद पढ़ाई या नौकरी करने का कोई फ़ायदा नहीं।  

बिहार में महिलाओं की बेरोजगारी दर 95 प्रतिशत

बिहार की लगभग 95 प्रतिशत महिलाएँ आज भी रोजगार से वंचित है। उनकी जिंदगी केवल घर की चारदीवारी में ही बीतती है। महिलाओं के लिए सरकार ने आरक्षण भी दिए है लेकिन तब भी कई बार सरकारी लापरवाही के कारण तो कई बार पारिवारिक दबाव के कारण उन्हें रोजगार का अवसर नहीं मिलता। सरकार अपनी तरफ से अब हर संभव प्रयास करती नजर आरही है लेकिन परिवार वालो की मानसिकता में तनिक भी बदलाव देखने को नहीं मिलता। आज भी बिहार के लोग लड़कियों का काम करना गलत ही मानते हैं।  

बिहार में बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए सरकार ने कई  योजनाए शुरू की लेकिन बिहार सरकार की इतने प्रयासों के बावजूद बिहार की महिलाओं के पास रोजगार उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा एक पहलु यह भी है की बिहार में माँ बाप अपनी लड़कियों को नौकरी नहीं करने देना चाहते। अधिकतर परिजनों का मानना है की लड़कियां नौकरी करके क्या करेंगी आखिर में तो उन्हें घर ही संभालना है। 

फॅमिली प्रेशर के कारण अधिकतर लड़कियों के सपने अधूरे ही रह जाते हैं। इंटर की पढ़ाई पूरे होने के बाद से ही उनपर शादी करने का दबाव आने लगता है। इसके अलावा कुछ लड़कियों को तो अपनी शिक्षा पूरी करने का भी समय नहीं दिया जाता है। और शादी करा दी जाती है। शादी के बाद घर गृहस्थी के दबाव में आने के बाद उन्हें कुछ सिखने या करने का अवसर ही नहीं मिलता।  

 बिहार की ज्यादातर महिलाओं के साथ यही समस्या होती है। उन्हें लगातार घर से शादी का प्रेशर आने लगता है। परिजनों का कहना यही होता है की शादी कर लो उसके बाद जो करना है करो।  वहीं, उनकी शिक्षा में भी काफी रुकावट होती है, उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती है। बिहार में लड़कियां यहां सिर्फ 12वीं और 10वीं तक पढ़ाई सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि सरकार से पैसे मिलते हैं। परिवार वाले भी इसलिए उन्हें पढ़ाते हैं।  

बिहार में दहेज का प्रचलन बहुत आम 

बिहार में दहेज़ का प्रचलन बहुत आम है। यहां बिना रोक टोक दहेज़ की मांग की जाती है और दहेज़ न मिलने पर शादी तोड़ दी जाती है। सरकार की जागरूकता के प्रयासों, शिक्षा के बढ़ते स्तर और रोजगारों में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी के बावजूद दहेज रुपी कुप्रथा को ख़त्म नहीं किया जा सका है। बिहार में समाज की बहुत बड़ी आबादी आज भी दहेज के नाम पर महिलाओं से क्रूरता से पेश आती है। लड़की भले ही कितनी भी पढ़ी लिखी हों, नौकरी पेशा हो लेकिन शादी के लिए दहेज़ की शर्त पूरी करनी ही पड़ती है। हालांकि सरकार ने दहेज़ पर रोक लगाने के लिए कई कड़े कानून बनाए है जिसके तहत आरोपियों को तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान है। लेकिन कड़े कानून व्यवस्था के बावजूद आज भी बिहार में दहेज़ रुपी कुप्रथा सांस ले रही है। आज के दौर में भी पढ़े लिखे लोग भी दहेज़ की मांग खुलकर करते है। दहेज़ के लालची बिना सामने वाले की समस्या को समझे मुँह खोलकर मांग करते है जिसके कारण अधिकतर गरीब परिवारों को अपनी बेटियों की शादी के लिए अपने घर और खेत बेचने पड़ते है और यह भी एक बड़ा कारण है जिससे राज्य में कन्या भ्रूण हत्या के मामले ज्यादा देखने को मिलते है। 

दहेज के रेट में 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी

बिहार में पिछले साल के मुकाबले दहेज का रेट इस साल करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। जिसमे इंजीनियर का 10 से 30 लाख रुपए तक है तो वहीं आईएएस को मुंहमांगी कीमत मिल रही है। कुछ साल पहले एक बैंक क्लर्क का दहेज़ 6-8 लाख था, लेकिन अब 7 से 10 लाख तक है। इसी तरह बाकी कैटेगरी के वर के लिए भी रेट में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। 

बिहार में लोगों ने दहेज लेने के अपने-अपने तरीके इजाद किये हैं। कुछ लोग पैसों की जगह जमीन और जेवर मांगते हैं। लड़के के नाम से जमीन लिखवा ली जाती है या फिर यह कह दिया कि लड़की को इतने तोला सोने का जेवर पहना कर विदा करें। 

दहेज में कैश, जेवर और गाड़ी और घर का फर्नीचर तो जरूरी है ही। इसके अलावा भी लंबी लिस्ट होती है। इलेक्ट्रॉनिक गुड्स के ब्रांड तक तय किए जाते हैं। लिस्ट में खाने-पीने के मैन्यू और बारात ठहराने के लिए एसी और नॉन एसी कमरों तक की शर्त रखी जाती है। बैंड कौन सा होगा, ये तभी तय किया जाता है।  आईपीएस और अलॉयड सर्विस वालों के लिए 50 से 75 लाख कैश और 25 लाख का सामान, जेवर आदि तय किए जाते हैं।

बिहार में कन्या भ्रूण हत्या के सबसे ज्यादा मामले 

उत्तरप्रदेश और बिहार में सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्या के मामले दर्ज किये जाते हैं। यहां के लोगो को लड़कियां बोझ लगती हैं। ताजा आंकड़े साबित करते हैं कि लड़कियों को गर्भ में ही या पैदा होते ही मार देने की घटनाएं बहुत बढ़ी हैं। इनका मानना है की लड़कियों के विवाह में अक्सर दहेज़ का खर्चा बहुत होता है। सारी ज़िन्दगी उनका लालन पालन और शिक्षा देने के बाद उनका विवाह और दहेज़ का खर्चा अक्सर बाप की कमर तोड़ देता है। इसीलिए उन्हें जन्म देकर उन्हें लालन-पालन से उनके विवाह तक में खर्चा करने से आसान उन्हें उसे गर्भ में ही मार देना लगता है।  

रिकॉर्ड तोड़ रेप केस से डरे अभिभावक नहीं भेजना चाहते बाहर 

बिहार में रिकॉर्ड तोड़ आते दुष्कर्म के मामलों से भी परिवारवाले अक्सर दहशत में रहते हैं और यह भी एक कारण है की परिवारवाले अपनी लड़कियों को बाहर भेजने से डरते हैं। बिहार में नौकरी लगभग ना के बराबर है इसीलिए बिहार के लोगों को नौकरी की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता है। लेकिन लगातार आते दुष्कर्म के मामलो के डर से परिवारजन अपनी बेटियों को अकेले इन महानगरों में नहीं छोड़ना चाहते। 

बिहार में इस वर्ष जनवरी से जुलाई तक दुष्कर्म के कुल 825 मामले विभिन्न थानों में दर्ज किए गए हैं। एक आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इस वर्ष जनवरी में 88 मामले, फरवरी महीने में 105, मार्च में 129, अप्रैल में 82, मई में 120, जून में 152 और जुलाई में 149 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं। लगातार बढ़ते मामले लड़कियों के माँ बाप को दहशत से भर देने के लिए काफी हैं। 

बिहार में महिला सशक्तीकरण: रोजगार दिलाने के लिए सरकार चला रही कई योजनाएं

बिहार में महिला सशक्तीकरण, बिहार सरकार की नीतियों एवं योजनाओं का एक ख़ास मुद्दा है। बिहार सरकार ने बिहार में महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने, उन्हें रोजगार के अवसर मुहैया कराने तथा उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। सरकार की इन योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को सशक्त व आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है साथ ही उनकी आय में भी लगातार इजाफा हो रहा है।

बिहार सरकार ने बिहार के लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की है। इनमें सबसे प्रमुख मुख्यमंत्री उद्यमी योजना है। जिसके तहत बिहार के युवा और महिला उद्यमियों को उद्योग शुरू करने के लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा महिला बटालियन, कौशल विकास, जीविका : सशक्तीकरण का सशक्त माध्यम भी बिहार सरकार द्वारा शुरू की गई कुछ योजनाएं हैं। 

महिलाओं को मिला कम अवसर

बिहार चुनाव में महिला वोटरों की गिनती तो लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी आज भी बहुत कम है। ऐसे नहीं है की महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता नहीं या वो इस काम के लिए अयोग्य है। बस उन्हें अवसर प्राप्त नहीं हुआ है। अगर बात करें चुनाव में महिलाओं के प्रदर्शन की तो आपको बता दे की साल 2015 के चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने 10 महिलाओं के टिकट दिया और सभी चुनाव जीत कर आईं थी।    

बिहार में महिला सशक्तीकरण में सोशल मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है

महिला सशक्तीकरण के मामले में लोगों को जागरूक करने के लिए सोशल मीडिया एक बेहतर माध्यम साबित हो सकता है। हालांकि भारत का महिला और बाल विकास विभाग महिलाओं के उत्थान के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है और सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाए भी अपने स्तर पर महिलाओं के विकास के लिए काम कर रहें हैं, लेकिन कई मामलों में ऐसा देखा गया है की सोशल मीडिया लगातार कई वर्षों से इस दिशा में काफी सक्रिय रही है। महिला सशक्तीकरण तथा महिलाओं के अधिकार के सन्दर्भ में सोशल मीडिया के माध्यम से सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं। कई ऐसे आपराधिक मामलें देखे गए हैं जिसमें पीड़ितों को सोशल मीडिया के माध्यम से ही न्याय मिल पाया क्योंकि जनता ने सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ आवाज उठाई और सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखा। सभी केस में सोशल मीडिया ने अंत तक साथ निभाया जो की बहुत प्रशंसनीय है। 

इसके अलावा सोशल मीडिया ने हमारी महिलाओं को भी आत्मनिर्भरता के लिए प्रोत्साहित किया है। समाचारपत्रों और टीवी पर प्रसारित होती प्रोत्साहन वाली खबरों और योजनाओं की जानकारी का भी हमारी महिलाओं के विचारों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।

सत्ता से लेकर रोजगार तक, जानें बिहार में महिला सशक्तीकरण के तहत उठाए गए कदम: 

सत्ता से लेकर रोजगार तक, जानें बिहार में महिला सशक्तीकरण के तहत उठाए गए कदम:

सत्ता में महिलाओं की सीधी भागीदारी: बिहार पहला ऐसा राज्य है जहां पंचायत और शहरी निकायों में महिलाओं के लिए पचास फीसदी आरक्षण दिया जाता है। आरक्षण प्राप्त होने के कारण राजनीति कार्यों के निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। राज्य में वर्तमान समय में कुल 8442 मुखिया में पांच हजार महिला मुखिया है। जिला परिषद हो या नगर निगम, अब हर जगह धीरे धीरे महिलाओं की मौजूदगी दिखनी शुरू हो गई है। 

महिला सम्मान को अहमियत देना: महिला सम्मान को अहमियत देने के लिए सरकार ने साल 2008 में मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना की शुरुआत की थी। इस योजना उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाकर उन्हें समाज में एक अलग पहचान दिलाना था। इसके अलावा सरकार ने राज्य में कन्या भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी अपराधों को जड़ से मिटाने और कन्या जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना, कन्या उत्थान योजना तथा कन्या सुरक्षा योजना के शुरू की थी।  

सरकारी नौकरी में मजबूत हिस्सेदारी: साल 2016 में सरकार द्वारा सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत तक आरक्षण निर्धारित किया गया था। इसके अलावा शिक्षा विभाग में भी महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान रखा गया था। इस आरक्षण  माध्यम से सरकार की मंशा केवल यही है कि आरक्षण के माध्यम से महिलाओं को एसडीएम, बीडीओ, सीओ और थानेदार जैसे पदों पर भी तैनाती मिले। आरक्षण के कारण से आज नियोजित शिक्षकों की कुल संख्या 3 लाख 51 हजार है जिसमें से करीब 2 लाख शिक्षक पदों पर महिलाएँ हैं। 

एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार बिहार पुलिस में 25.33 प्रतिशत महिलाएँ कार्यक्रत हैं। बिहार में पुलिस बल की कुल संख्या लगभग 92,000 है, जिसमें से केवल 23,245 महिलाएँ है। 

 शिक्षा के क्षेत्र में सुधारवादी कदम: बिहार में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना तथा मुख्यमंत्री बालिका प्रोत्साहन योजना जैसी कई योजनाओं की शुरुआत की जिसके परिणामस्वरूप पहले के मुकाबले अब स्कूलों में छात्राओं के नामांकन में इजाफा देखने को मिला है। बिहार सरकार ने अब राज्य के सभी मेडिकल, इंजीनियरिंग और स्पोर्ट्स कॉलेजो में लड़कियों के लिए 33 प्रतिशत सीट आरक्षित कर दी हैं। बिहार पहला ऐसा राज्य है जिसने महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सभी कॉलेजो में आरक्षण की घोषणा की है। 

बिहार सरकार ने राज्य में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय योजनाओं की शुरुआत भी की है जिसके तहत सभी इंटरमीडिएट पास अविवाहित लड़कियों को 25 हजार रुपये और स्नातक पास लड़कियों को 50 हजार रुपये दिए जाने की घोषणा की है। 

महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश: बिहार में महिलाओ को सशक्त व आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगार व उद्यमशीलता बेहद कारीगर साबित हो सकती है। बिहार में महिलाओं को स्वरोजगार स्थापना और उद्यमशीलता की ओर प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई तरह की योजनाएं शुरू की है। जिससे जुड़कर महिलाएँ अपने घर से स्वयं का कोई भी लघु व्यवसाय स्थापित कर सकती हैं। 

जीविका के क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह ने बहुत ही सराहनीय काम किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बिहार में लगभग 34260 स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) का गठन किया गया है।  स्वयं सहायता समूह के माध्यम से राज्य के गरीब परिवार की 4.30 लाख महिलाओं को लाभ प्राप्त हुआ है। 

स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने अपनी छोटी छोटी बचत करके करीब 4 करोड़ रुपये जमा किए हैं। सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान महिला उद्यमियों की सहायता के लिए महिला उद्यमी योजना (Women Entrepreneur Scheme) की शुरुआत की थी। जिसके तहत राज्य की महिला उद्यमियों को स्वरोजगार स्थापना के लिए 10 लाख रुपये तक की मदद करने का प्रावधान रखा गया है। इस योजना के अंतर्गत महिला उद्यमियों को सरकार की तरफ से पांच लाख सब्सिडी के रूप में दिया जाएगा और बाकी पांच लाख लोन के रूप में दिया जाएगा। 

समाज की भागीदारी भी जरूरी: इसमें कोई दोराय नहीं की सरकार महिलाओं को सशक्त व आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है, लेकिन समाज का भी यह दायित्व बनता है कि वे भी सरकारी योजना के मूल उदेश्य को पूरा करने में सरकार का सहयोग करें। महिलाओं की शिक्षा में कमी, दहेज़ प्रथा, बाल विवाह, सामाजिक असमानता और पुरुषवादी मानसिकता ही बिहार में महिला सशक्तीकरण की राह में बड़ी बाधा है। इसे जड़ से समाप्त करने के लिए समाज को भी अपनी भागीदारी करनी चाहिए। 

बिहार में महिला सशक्तीकरण के लिए हिन्दराइज फाउंडेशन की पहल

बिहार में महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए हमारी संस्था हिन्दराइज फाउंडेशन प्रदेश में महिलाओं के उत्थान के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। हमारी संस्था हिन्दराइज बिहार में महिलाओं को सशक्त बनाने तथा उन्हें स्वरोजगार स्थापना की और प्रेरित करने के लिए अथक प्रयास कर रही है। जिसके तहत हम महिलाओं के कौशल विकास के लिए उन्हें ट्रेनिंग देते है। साथ ही हम उन्हें उनकी लघु उद्योग स्थापना में मदद करते है।

हमारी संस्था हिन्दराइज फउंडेशन महिला उद्यमियों को स्वयं का लघु व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करती है साथ ही संस्थान द्वारा उन्हें लघु उद्योग स्थापना के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। इस ट्रेनिंग के अंतर्गत हमारी संस्था महिलाओं को लाइसेंसिंग, छोटे उद्योगों को कैसे संचालित करें, फंड कैसे मैनेज करें और साथ ही टैक्सेशन आदि की जानकारी भी देती है। 

निष्कर्ष 

बिहार में महिला सशक्तीकरण में समाज की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसी भी देश की प्रगति तब तक नहीं हो सकती जब तक उस देश की राजनीति ,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में वहां की महिलाएँ सशक्त बन कर न उभरी हों। सरकार की नीतियों और योजनाओं के बावजूद सच यह है कि महिलाओं को आज भी तरह-तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझना पड़ता हैं। जब तक परिवारवाले और समाज महिलाओं के प्रति अपनी सोच को नहीं बदलेंगे तब तक बिहार में महिला सशक्तीकरण का संकल्प पूरा नहीं किया जा सकेगा।

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