सीतामढ़ी में चिकित्सा व्यवस्था का हाल बेहाल: कब बदलेगी बिहार में चिकित्सा व्यवस्था की रूप रेखा
| Updated: Jul 16, 2021 | Category: Blog

सीतामढ़ी में चिकित्सा व्यवस्था का हाल बेहाल: कब बदलेगी बिहार में चिकित्सा व्यवस्था की रूप रेखा

आबादी के मामले में भारत के तीसरे सबसे बड़े इस राज्य बिहार में चिकित्सा व्यवस्था (Health system in Bihar) वर्षों  से तय मानकों से काफी नीचे है। बिहार में चिकित्सकों की कमी नई बात नहीं है। लेकिन चिकित्सकों की नियुक्ति के बाद भी चिकित्सा का अभाव लोगों के दर्द को और बढ़ा देता है। और यही कारण है की सरकारी अस्पताल की अपेक्षा निजी अस्पतालों में ज्यादा भीड़ रहती है। 

ऐसा नहीं है की निजी अस्पतालों में ज्यादा योग्य चिकित्सक मिलते हैं लेकिन सरकारी अस्पतालो की असुविधा और लापरवाही को देखते हुए लोगों का विश्वास सरकारी अस्पताल की चिकित्सा और चिकित्सकों पर से बिलकुल उठ गया है। सरकारी अस्पतालों कि इन परेशानिओं को देखते हुए अधिकतम लोग अपने प्रियजनों के इलाज के लिए प्राइवेट हॉस्पिटल में ही जाना उचित समझते है। प्राइवेट हॉस्पिटल की अच्छी चिकित्सा व्यवस्था के कारण लोगों की जान तो बच जाती है पर हॉस्पिटल के खर्चो और दवाइयों के बिल्स के कारण अधिकतम मध्यम वर्ग के लोगो को लगभग कंगाली का सामना करना पड़ता है। देखा जाए तो एक सामान्य व्यक्ति को अपनी आय का अधिकतम हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए देना पड़ता है।  वही दूसरी तरफ एक पहलू यह भी है कि देश के बहुत सारे अस्पतालों और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों और नर्सो की नियुक्ति के बावजूद जरूरतमंद लोगों को उनकी सेवाएं नहीं मिल पाती हैं। ऐसे डॉक्टरों की तादाद बहुत बड़ी है जो किसी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पर अपनी ड्यूटी पर मौजूद रहना जरूरी नहीं समझते, अधिकतम सरकारी डॉक्टर अपना ज्यादा समय अपने निजी क्लीनिक और प्रैक्टिस को ही देते है। इस परेशानी की मार अधिकतम दूरदराज के इलाकों में रह रहें लोगों को झेलनी पड़ती है, जहां स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे हालत में ग्रामीण इलाकों के लोगों को मजबूरन बिना किसी चिकित्सा डिग्री वाले झोलाछाप डॉक्टरों से ही इलाज कराना पड़ता है। जिससे मरीजों की छोटी से छोटी बीमारी गंभीर रूप ले लेती है और फिर मरीजों की जान चली जाती है।

हालांकि देखा जाए तो अलग अलग सरकारों ने अलग-अलग नामों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधारों और अच्छी व्यवस्था के लिए कई तरह की योजनाएं लागू की हैं। लेकिन अगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक में संकट के समय में डॉक्टर या नर्स उपलब्ध नहीं होते हैं तो उन योजनाओं का कोई फ़ायदा नहीं है। इससे साफ़ जाहिर होता है की सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र का ढांचा कमजोर है और वही दूसरी तरफ देखा जाए तो इसका बड़ा फ़ायदा निजी अस्पतालों को हो रहा है, आए दिन निजी अस्पतालों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक तरफ बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते सरकारी अस्पताल है और वही दूसरी तरफ जरुरी उपकरणों और लाखों की फीस वाले डॉक्टरों से लैस 5 स्टार वाले निजी अस्पतालों की बढ़ती हुई शृंखला है। यह तो हम सभी जानते है की किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति का ऐसे 5 स्टार हॉस्पिटल में इलाज करना संभव नहीं है और ऐसे में जब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी होती है तो यह उन लोगो पर दोहरी मार साबित होती है। देश की सफलता की कसौटी पर चिकित्सा व्यवस्था (Health system in Bihar) की इस अफसोसजनक हालत के सामने विकास का हर दावा झूठा साबित होता है।

सीतामढ़ी में बदहाल चिकित्सा व्यवस्था 

मौजूदा समय में बिहार के सीतामढ़ी (Hospital in sitamarhi) सहित कई क्षेत्रों के जिला अस्पतालों में ह्रदय रोग के लिए चिकित्सक और जरुरी उपकरण न होने के कारण यहाँ के मरीजों को सही इलाज के लिए मजबूरी में दिल्ली और बरेली तक का  सफर तय करना पड़ता है। सीतामढ़ी में चिकित्सा व्यवस्था  (Health Care system in Bihar) खराब होने के कारण यहाँ छोटे से छोटे रोगो के लिए भी उचित चिकित्सा उपलब्ध नहीं है, बिहार के लोगो को बेहतर चिकित्सा के लिए दिल्ली के एम्स और सफदरजंग जैसे अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें हज़ारो किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। हालांकि बिहार की राजधानी पटना में भी एक एम्स हॉस्पिटल उपलब्ध है लेकिन यहाँ भी अक्सर लोगो को अच्छे चिकित्सक और बेहतर चिकित्सा व्यवस्था की कमी का सामना करना पड़ता है। अगर बात करे दिल्ली में स्थित एम्स और सफदरजंग जैसे अस्पतालों की तो यहाँ की भी व्यवस्था सराहनीय नहीं है। चिकित्सा के लिए पहले लंबी लाइनों में लगकर जरुरी दस्तावेजों को तैयार करना पड़ता है जिसमे कई दिन निकल जाते है, सरकारी अस्पतालों में एक कर्मचारी से दूसरे कर्मचारी के हस्ताक्षर लेने में ही मरीजों का अधिकतम समय बीतता है, और इसमें भी अधिकतम समय सरकारी छुट्टियाँ, डाक्टरों का अस्पताल में उपलब्ध ना होना और कई बार तो मेडिकल स्टाफ की मांगो को लेकर धरना प्रदर्शन के कारण अस्पतालों में काम बंद कर दिया जाता है जिससे इलाज में देरी हो जाती है। और आखिरी में कई दिनों की जद्दोजेहद के बाद जब तक मरीज का रोग सामने आता है तब तक देर हो जाती है और इसी प्रकार हर साल लाखों लोगो की मृत्यु इलाज से पहले ही केवल सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटने से हो जाती है। 

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था सबसे ख़राब 

एक आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार देशभर में सबसे खराब चिकित्सा व्यवस्था केवल बिहार (Hospital in Bihar) की है। भारत के सभी राज्यों में से सबसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधा वाले राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब हैं। जबकि सबसे ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं वाले राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।

 बिहार में चिकित्सकों की भारी कमी

साल 2019 में जब उत्तर बिहार के जिलों में चमकी बुखार का प्रकोप फैला था और इस दौरान लगभग 185 से अधिक बच्चों की मौत हो गयी थी। बिहार में चिकित्सा व्यवस्था पर जब सवाल उठाए गए तो एक जनहित याचिका के जवाब में बिहार सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया था कि उनके राज्य में चिकित्सकों की भारी कमी है। पूरे राज्य में चिकित्सकों के लिए 57% पद अभी भी खाली हैं। जबकि नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए भी तीन चौथाई पद खाली हैं, जिनकी आपूर्ति अभी तक नहीं की जा सकी है। 

कोरोना महामारी में स्थिति और भी चिंताजनक

महामारी के दौरान बिहार की चिकित्सा व्यवस्था और भी खराब हो गयी थी। संकट के इस समय में बिहार में चिकित्सा व्यवस्था  (Health Care system in Bihar) बुरी तरह से चरमरा गई थी। देश भर में लोगो को दवाइयों और आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी का सामना करना पड़ रहा था। कहीं लोगो को जमीन पर लेटकर और बैठकर अपना उपचार कराना पड़ रहा था वहीं कुछ अस्पतालों में नए बेड पड़े पड़े धूल खा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की कमी के कारण हज़ारों लोगों को अपनी जान भी गवानी पड़ी। 

पूरे बिहार में सिर्फ पटना में चिकित्सा व्यवस्था कुछ बेहतर 

22 फरवरी, 2021 को पेश किए गए बजट में 13,264 करोड़ रूपए के खर्च का प्रावधान रखा गया है, जिसे पिछले वर्ष के मुकाबले 21.28% अधिक बताया जा रहा है। लेकिन इसमें से बड़ी राशि केवल अस्पतालों के निर्माण पर खर्च की जाएगी, इनमे से भी ज्यादातर अस्पतालों का निर्माण पटना और आसपास के इलाके में किया जाएगा।

बिहार के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है तो निश्चित तौर पर इन सुविधाओं का विकास गांवो और पिछड़े इलाकों में होना चाहिए। यदि देखा जाए तो अभी कुछ हद तक स्वास्थ्य सुविधा केवल पटना में ही उपलब्ध है। बिहार के हर जिले से लोगो को बेहतर इलाज के लिए पटना का रुख करना पड़ता है। हालांकि पटना में भी स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत सराहनीय नहीं है यहाँ भी लोगों को बेहतर इलाज और सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ता है। 

ऐसा नहीं है की पटना में स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर होने से बिहार को चिकित्सा क्षेत्र में विकास की आवश्यकता नहीं। मगर यह विकास ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों में किया जाना चाहिए। लेकिन अभी बिहार सरकार का पूरा ध्यान केवल शहरी क्षेत्रों के अस्पतालों के विकास पर है। शहरी क्षेत्रो के अस्पतालों के विकास का मतलब है की अब गांव और कस्बों में रहने वाले लोगों को अपनी हर बीमारी के इलाज के लिए पटना राजधानी तक का सफर करना पड़ता है। 

हालांकि अब तक बिहार सरकार ने कई गांव और कस्बों में अस्पताल बनवाए है लेकिन अन्ततः सवाल यही उठता है कि केवल अस्पतालों की इमारतों का निर्माण कराने से क्या होगा जब तक उसमें अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था, जरुरी दवाइयां और सेवा भाव वाले चिकित्सक उपलब्ध नहीं होंगे तब तक स्थिति यही बनी रहेगी। 

बिहार में मौजूद इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी काफी समय पहले बनकर तैयार हो गया है, लेकिन उसे अभी तक स्वास्थ्य विभाग के हवाले नहीं किया गया है। बिहार के अस्पतालों की कमी जस की तस है हलाकि सरकार ने इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए भी हैं लेकिन वह केवल ऊंट के मुंह में जीरा के समान साबित होता है। 

जिला अस्पतालों में स्वास्थकर्मियों की उपलब्धता के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है लेकिन सरकार सभी भर्तियां ठेके पर करना चाहती है और चिकित्सक कॉन्ट्रैक्ट बेस पर नौकरी करना नहीं चाहते।

चिकित्सकों की कमी के पीछे शिक्षा व्यवस्था भी जिम्मेदार 

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली के पीछे कई हद तक वहां की शिक्षा व्यवस्था भी जिम्मेदार है क्योंकि बिहार की खराब शिक्षा व्यवस्था के कारण वहां के छात्र अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाते और उन्हें बाहर का रूख करना पड़ता है। यहां के छात्र बाहर शहरों में शिक्षा प्राप्त करने जाते है और फिर वही किसी निजी अस्पताल में नौकरी प्राप्त करके वही अपनी सेवा प्रदान करते हैं।  यदि बिहार में भी अच्छे मेडिकल कॉलेज खुल जाए तो यहाँ के छात्रों के भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए बाहर शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा तथा वे यहीं शिक्षा प्राप्त करके अपने गांव और शहरों में ही अपनी प्रैक्टिस कर पायंगे। 

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था क्षेत्र में सरकार द्वारा मत्वपूर्ण कदम 

बिहार सरकार ने अपने वित्तीय बजट 2021-2022 में चिकित्सा क्षेत्र के लिए रुपये 13,264 करोड़ का प्रावधान रखा है। इस बजट में से तक़रीबन 6,900 करोड़ रुपये विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाएंगे, जबकि 6,300 करोड़ रुपये का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में निर्माण कार्यों के लिए किया जाएगा।

इस बजट के अनुसार देखा जाय तो बिहार में चिकित्सा व्यवस्था (Hospital in Bihar) की मौजूदा स्थिति को सुधारने के लिए ये राशि बहुत कम है। और साथ ही इस बजट में बहुत से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी अनदेखा किया गया है, जिन्हें इस प्रस्तावित राशि की ज्यादा जरूरत है। इन क्षेत्रों में दवाओं की आपूर्ति, चिकित्सकों की भर्ती और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता शामिल है।

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था क्षेत्र में सुधार के उपाय

  1. देश को चिकित्सा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकारों को जरुरी कदम उठाने चाहिए जैसे की गांवों की चिकित्सा व्यवस्था के लिए यदि नए अस्पताल और मेडिकल विश्वविद्यालय शहरों के बजाय गांवो में भी खोले जाए और इन विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त करने वाले डाॅक्टरों की पोस्टिंग केवल गांवों में ही की जाए तो इससे कुछ मदद मिल सकती है। 
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में अलग अलग शिक्षा पद्धति जैसे एलोपैथी, आयुर्वेद और होमियोपैथी के बजाय ऐसे डाॅक्टर तैयार किए जाय जो ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिए इच्छुक हों। 
  3. गांवो में काम करने वाले डॉक्टरों का वेतन अधिक किया जाय और उन्हें सुविधाएं भी अधिक दी जाए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर काम करने में उनकी रूचि बढ़े।
  4. बिहार में चिकित्सा व्यवस्था की खराब हालात का कारण केवल सरकार ही नहीं है बल्कि कई मेडिकल डिग्री प्राप्त डॉक्टर भी है। चूंकि अधिकतम एमबीबीएस डिग्री प्राप्त डाॅक्टर IAS  करके प्रशासनिक सेवाओं में लग जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है की यदि उन्हें आईएएस की ही नौकरी करनी है तो वे MBBS क्यों करते है। 
  5. इसके अलावा अनेक डाॅक्टर ज्यादा पैसे कमाने के लालच में विदेशों नौकरी करते हैं। दुर्भाग्यवश हमारी सरकारें चाहते हुए भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित डाॅक्टर उपलब्ध नहीं करा पाती है ऐसे डॉक्टरों के पैसे के बजाय देश सेवा के बारे में सोचना चाहिए।
  6. देश में चिकित्स्कों की कमी का एक कारण यह भी है की देश में मेडिकल काॅलेजों भारी कमी है, जिसके कारण छात्र मेडिकल की शिक्षा नहीं ले पाते जिसके कारण देश में डाॅक्टरों के पद खाली पड़े हैं। बेहतर रोजगार के लिए बेहतर शिक्षा का होना भी आवश्यक है। चिकित्सा के क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मेडिकल कॉलेजों की कमी को भरना आवश्यक है।
  7. ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी का कारण है सुविधाओं की कमी यानी गांवों में डाॅक्टरों के रहने और काम करने के लिए सही व्यवस्था और आधुनिक उपकरणों का ना होना, प्राइवेट प्रेक्टिस से उन्हें शहरों की अपेक्षा कम आमदनी है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में उनके बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों की कमी है यह भी एक कारण हो सकता है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों के लिए अच्छी कमाई उज्जवल भविष्य जैसे विशेष आकर्षण नहीं होंगे तब तक डॉक्टर वहां नहीं जाएंगे और जब तक डॉक्टर इन इलाकों में कार्यरत नहीं होंगे तब तक भारत चिकित्सा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के स्वपन् को कभी पूरा नहीं कर पायेगा।

सीतामढ़ी में चिकित्सा व्यवस्था सुधार में हिन्द राइज फाउंडेशन का योगदान

कोविड-19 के दूसरी लहर के दौरान सीतामढ़ी के अस्पताल (Hospital in Sitamarhi) में बिस्तर या ऑक्सीजन सिलेंडर के अभाव में कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। दूसरी लहर के दौरान स्थिति बहुत खराब थी। कोरोना महामारी ने लोगों को आज अस्पतालों की एहमियत समझा दी। महामारी के दौरान अस्पतालों और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था उपलब्ध ना होने के कारण कई लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी। 

हिन्दराइज फाउंडेशन के प्रयासो से बिहार के कई क्षेत्रों में कई लोगो की जान बचाई गई। हिन्द राइज फाउंडेशन और आत्मनिर्भर सेना संगठन के संस्थापक श्री नरेंद्र कुमार जी का कहना है की हम बिहार में आधुनिक और किफायती अस्पताल खोलने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने इस मिशन की शुरुआत अपने गांव वलीपुर सरंचिया से शुरू की है। 

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार सीतामढ़ी जिले में 134 सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र की आवश्यकता है,  लेकिन जिले में केवल 16 सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र ही उपलब्ध हैं। बिहार सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह शेष 118 पीएचसी का निर्माण कर सके, इसके लिए गैर सरकारी संगठन द्वारा निजी क्षेत्रों में किफायती अस्पताल विकसित करना आवश्यक है।

संसाधनों की कमी के कारण स्वास्थ्य उपकेंद्र भी सही तरीके से काम नहीं कर रहें हैं और पूरे बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था के संचालन में उचित निगरानी नदारद है। 

स्वास्थ्य उपकेंद्र की जमीनी हकीकत बहुत ही खतरनाक है क्योंकि ज्यादातर स्वास्थ्य उपकेंद्र एक ही खास दिन पर खोले जाते हैं। बाकी दिन जनता को गाँव में या तो अनधिकृत मेडिकल स्टोर से इलाज कराने के लिए मजबूर होना पड़ता है और गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों के मामले में उन्हें निजी डॉक्टरों और नर्सिंग होम में जान बचाने के लिए दिल्ली तक का सफर तय करना पड़ता है।

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था के बारे में जानने योग्य बातें

  • बिहार में, हमारे पास अस्पताल में प्रति 10,000 की  जनसंख्या पर 2.5 बिस्तर हैं, जबकि सरकारी आकड़ो के अनुसार प्रति 10,000 की जनसंख्या पर औसतन 5 बिस्तर होने चाहिए। आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारी स्वास्थ्य को किस हद तक विकास की जरुरत हैं।
  • वैश्विक स्तर पर बेड की उपलब्धता के मामले में भारत 155वें स्थान पर है। जिसके अनुसार भारत में 10,000 भारतीयों के लिए सिर्फ पांच बेड हैं।
  • जबकि इस मामले में बांग्लादेश भी भारत से कुछ बेहतर है वहां प्रति 10,000 की  जनसंख्या पर 8 बेड उपलब्ध हैं। 

निष्कर्ष 

हमारे संगठन हिन्दराइज फाउंडेशन में हम, उन व्यक्तिओं और उनके विचारों का स्वागत करते है जो बिहार में चिकित्सा व्यवस्था (Health Care system in Bihar) में सुधार चाहते है और अपने विचारों तथा सुझावों को सरकार तक पहुंचना चाहते है। एक संगठन के रूप में हम आपके विचारों और सुझावों को सरकार तक पहुंचाते है और चिकित्सा क्षेत्र को सुधारने तथा आम आदमी के लिए चिकित्सा सुविधाओं को आसान बनाने में मदद करते है। इसके साथ ही हम आपके सुझावों पर सरकारी अस्पतालों में उपकरणों की कमी को पूरा करने तथा डॉक्टरों की उपस्थिति को सुनिश्चित कराने जरुरी मुद्दों को सरकार के सामने रखते है।

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