मिथलांचल विशेष में: क्या है भागलपुर स्मार्ट सिटी परियोजना की सच्चाई?
| Updated: Sep 28, 2021 | Category: Blog

मिथलांचल विशेष में: क्या है भागलपुर स्मार्ट सिटी परियोजना की सच्चाई?

देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जब स्मार्ट सिटी की सूची जारी की थी तब इस सूची में बिहार के एक भी शहर का नाम शामिल ना होने से आहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्मार्ट विलेज की घोषणा की थी। इस घोषणा के तहत उन्होंने बिहार के कई शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के वादे भी किए थे। जिसके तहत उन्होंने भागलपुर में स्मार्ट सिटी परियोजना की शुरुआत भी कर दी थी। उन्होंने जिन शहरों में इस परियोजना की शुरुआत की ये शहर- भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना व बिहार शरीफ हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है की भागलपुर में स्मार्ट सिटी  परियोजना के पांच साल पूरे होने में अब बस कुछ ही महीने बाकी है लेकिन अब तक बिहार का एक भी शहर स्मार्ट सिटी नहीं बन पाया है। हर वर्ष 200 करोड़ के हिसाब से पांच वर्षों में हर स्मार्ट सिटी का एक हजार करोड़ का बजट था, लेकिन अब तक हर सिटी को सिर्फ दो-दो सौ करोड़ ही मिले हैं। इसमें केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की भागीदारी 50 -50 प्रतिशत है। यानी हर साल सौ करोड़ केन्द्र को देना होगा और सौ करोड़ राज्य सरकार को अपनी तरफ से लगाना होगा। लेकिन यह राशि अब तक खर्च नहीं हो सकी। फंड रहते हुए भी भागलपुर स्मार्ट सिटी में परियोजना में काम नहीं हो रहा है। राज्य सरकार ने केन्द्र की राशि का उपयोगिता प्रमाणपत्र यानी दी गई राशि का इस्तेमाल कहां हुआ इसका प्रमाणपत्र नहीं भेजा, इसलिए केन्द्र ने दूसरी किस्त ही नहीं दी।

पांच साल की अवधि पूरी होने के बाद भी, एक भी शहर नहीं बना स्मार्ट

बिहार के चार शहरों में स्मार्ट सिटी परियोजना शुरू की गई थी। ये शहर- भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना व बिहार शरीफ हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी की स्मार्ट सिटी परियोजना को अब पांच साल पूरे होने वाले हैं लेकिन पांच साल में बिहार के चार शहरों में से एक भी शहर स्मार्ट सिटी नहीं बन सका। भागलपुर में स्मार्ट सिटी की परियोजना को पांच साल पूरे हो चुके है लेकिन काम बिलकुल ना के बराबर ही हुआ है जिससे मजबूरन सरकार को प्रोजेक्ट की अवधि को दो साल और बढ़ाना पड़ा। 

भागलपुर स्मार्ट सिटी परियोजना को पूरा करने के लिए समय सीमा बढ़ाई गई 

भागलपुर समेत स्मार्ट सिटी के लिए चुने गए बिहार के शहरों को प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए सरकार ने इस परियोजना की अवधि को दो साल के लिए बढ़ा दिया है। इसका सबसे बड़ा फायदा भागलपुर को हुआ है। भागलपुर में स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए निर्धारित समय सीमा  समाप्त हो चुकी थी। बिहार में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत सबसे पहले भागलपुर को साल 2016 में चुना गया था। पांच साल की अवधि होने के कारण भागलपुर प्रोजेक्ट कार्यकाल इसी वर्ष पूरा हो गया था लेकिन अभी तक यहां स्मार्ट सिटी से एक भी बड़ा प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया जा सका है। इसीलिए सरकार ने इस परियोजना की अवधि को बढ़ाने का निर्णय लिया है जिससे अधर में लटके विकास कार्यों को पूरा सके। 

जब पांच साल में कुछ नहीं बदला तो अब क्या बदलेगा?

बिहार के मुजफ्फरपुर को वर्ष 2017 में स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए चुना गया था। मुजफ्फरपुर के पांच साल की अवधि भी अगले साल 2022 में समाप्त हो रही है। इसके अलावा पटना को भी साल 2017 में ही स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया था और इसकी अवधि भी अगले साल समाप्त हो जाएगी। ऐसे में सरकार की तरफ से विस्तार मिलने से दोनों शहरों को भी अपने लंबित कार्यों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है। 

लेकिन सवाल ये उठता ये की जब सरकार बीते पांच वर्षों में कोई कमाल नहीं दिखा पाई तो अब दो वर्षों का विस्तार मिलने से क्या बदल जाएगा। बिहार में विकास कार्य कछुओं की चाल से चलते है। अपनी धीमी विकास रफ़्तार के कारण ही बिहार के किसी शहर को स्मार्ट सिटी का अवार्ड नहीं मिला। अब तो लगता है की भागलपुर केवल कागजों पर ही स्मार्ट सिटी बनकर रह जाएगा। क्योंकि इस कार्यकाल की अवधि पूरी होने के बाद केंद्र व राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त राशि स्मार्ट सिटी के मद में नहीं दी जायेगी। 

देश के अधिकांश शहरों में स्मार्ट सिटी में चयनित योजनाएं स्वीकृत हो चुकी हैं और निविदा के माध्यम से उसके निर्माण कार्य संचालित हो रहे हैं। स्मार्ट सिटी के तहत जिन योजनाओं का काम पूरा हो चुका है।  निकाय उससे आमदनी का स्रोत बनायेंगे और नयी योजनाओं के लिए बजट भी तैयार करेंगे। 

बिहार स्मार्ट सिटी की रेस में शामिल कौन सा शहर किस पायदान पर

भारत के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न 100 शहरों में स्मार्ट सिटी मिशन परियोजनाएं चलायी जा रही हैं। 100 शहरों में चल इस मिशन की प्रगति के सन्दर्भ में यह रैंकिंग की जाती है।

स्मार्ट सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के सभी 100 स्मार्ट शहरों में से पटना 61वें स्थान पर है। इस रैंकिंग के अनुसार बिहारशरीफ (70), भागलपुर (91) और मुजफ्फरपुर 99वें स्थान पर है। पिछले साल जब स्मार्ट सिटी अवार्ड दिए गए तो उसमें भी बिहार सबसे पीछे रह गया। बिहार के किसी भी शहर को स्मार्ट सिटी का अवार्ड नहीं मिला। पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड (PSCL) की जनसंपर्क अधिकारी हर्षिता जी ने बताया कि स्मार्ट सिटी अवॉर्ड में सबसे अधिक महत्व पैसों के इस्तेमाल, चल रही परियोजनाओं, टेंडर स्टेज में प्रोजेक्ट्स को दिया गया। स्मार्ट शहरों को आंकने के लिए कई पैरामीटर का ध्यान रखा गया। उन्होंने बताया कि बिहार में प्रोजेक्ट के लिए फंड का इस्तेमाल ठीक ढंग से नहीं किया जा रहा।

यदि compliance Parameter की बात करें तो मुजफ्फरपुर स्मार्ट सिटी की रेस में शून्य पर है यानि शहर इस श्रेणी में सबसे निचले पायदान पर है। और अब इसके उठने के आसार भी नहीं दिख रहे है क्योंकि इस परियोजना की अवधि पूरी हो चुकी है और यहां की व्यवस्था अभी भी जस की तस है। 

बिहार के किसी शहर को नहीं मिला स्मार्ट सिटी का अवार्ड 

साल 2020 में आयोजित इंडिया स्मार्ट सिटी अवार्ड्स के विजेताओं की लिस्ट में बिहार के किसी भी शहर का नाम शामिल नहीं है। केंद्रीय आवास और शहरी मंत्रालय ने स्मार्ट सिटी परियोजना के छह साल पूरे होने पर एक ऑनलाइन कार्यक्रम में इस अवॉर्ड का ऐलान किया था। इस स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत 100 शहर चुने गए थे, जिनमें बिहार के चार शहर- पटना, मुजफ्फरपुर, बिहारशरीफ और भागलपुर भी शामिल थे। लेकिन इनमें से किसी भी शहर को स्मार्ट सिटी का अवार्ड नहीं मिला। 

कभी बिहार का अंग था झारखण्ड, आज स्मार्ट सिटी की रेस में बिहार से भी आगे

15 नवंबर 2000 को जब झारखण्ड बिहार से अलग हुआ था तब लोगों ने कहा था की अब बिहार में लालू, बालू और आलू के अलावा और कुछ नहीं बचा है। जब झारखण्ड बिहार से अलग हुआ तब अधिकतर उद्योग झारखण्ड में चले गए थे। बिहार में केवल गिनती के मिल रह गए थे उनमें से भी अधिकतर अब बंद हो चुके है जिस कारण राज्य को भारी बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। लेकिन बिहार से अलग होने के बाद झारखण्ड की स्थिति पहले से काफी बेहतर है और बात करें स्मार्ट सिटी की तो इस मामले में झारखण्ड ने बिहार को काफी पीछे छोड़ दिया है। स्मार्ट सिटी की रैंकिंग में झारखण्ड का रांची 12 वें स्थान पर पहुंच गई है। यही नहीं राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों की सूची में झारखंड पहले पायदान पर और बिहार 27वें स्थान पर है।

योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रगति के आधार पर भारत सरकार के केन्द्रीय आवासान एवं शहरी कार्य मंत्रालय की ओर से स्मार्ट सिटी की रैंकिंग जारी की गई थी। इस रैंकिंग को देखने के बाद यह साफ़ पता चलता है की कभी बिहार का ही अंग होने वाले झारखण्ड ने स्मार्टनेस की रेस में बिहार को ही पछाड़ दिया है। 

स्मार्ट सिटी के तहत भागलपुर में अब तक कितना काम हुआ है 

स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत भागलपुर में सैंडिस कंपाउंड में ओपेन एयर थिएटर तैयार हो चुका है, बास्केटबॉल और लॉन टेनिस कोर्ट भी बनकर तैयार है और कैफेटेरिया निर्माण का काम भी लगभग पूरा हो चूका है। स्वीमिंग पुल बनाने का काम भी चल रहा है, अक्तूबर तक उसे पूरा कर दिया जाएगा। आइसीसीसी बिल्डिंग का टेंडर जारी किया जा रहा है। टाउन हॉल का टेंडर जारी हो गया है। नाइट शेल्टर का कार्यादेश जारी हो गया है।

प्रधानमंत्री जी के स्मार्ट सिटी को टक्कर देने वाले थे नीतीश कुमार के स्मार्ट विलेज

केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी योजना की लिस्ट में बिहार के एक भी शहर का नाम ना होने से आहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्मार्ट विलेज की घोषणा की। नीतीश कुमार जी ने कहा की बिहार के गांव स्मार्ट सिटी से भी सुंदर होंगे। बिहार के गांवों में वह सारी सुविधाएं होंगी, जिनके लिए लोग शहर जाते हैं। इसके अलावा 12वीं से आगे पढ़ाई करने वाले छात्रों को चार लाख का क्रेडिट कार्ड सरकार देगी। राजनीति विकास के लिए होनी चाहिए। राज्य में पांच साल में इतना काम होगा कि विरोधी छाती पीटते रह जाएंगे। पांच साल की अवधि पूरी हो गई है लेकिन आज तक बिहार का एक भी शहर स्मार्ट सिटी नहीं बन पाया है। हालांकि सरकार ने भागलपुर स्मार्ट सिटी परियोजना की अवधि को बढ़ा दिया है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है की जब सरकार पांच साल की अवधि में कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई तो अब दो वर्षों में क्या बदल जाएगा। 

स्मार्ट सिटी के तहत किस पैमाने पर रैंकिंग की जाती है 

स्मार्ट सिटी की रैंकिंग विभिन्न मापदंडों पर आधारित होती है, जिसमें स्मार्ट शहरों के मिशन परियोजनाओं को पूरा करना, जारी किए गए निविदाओं का संचयी मूल्य, काम पूरा करना और विकास के मद में दिए गए धन का उपयोग सही रुप में करना शामिल होता है। 

बिहार की राजधानी पटना में इस परियोजना की रफ़्तार काफी धीमी रही है जिस कारण इसका प्रदर्शन लगातार खराब रहा है लेकिन अधिकारियों का मानना है की दिसंबर में शुरु होने वाली परियोजनाओं से रैंकिंग के स्तर में इजाफा होने की उम्मीद है। अब सवाल यही है की क्या परियोजना की अवधि बढ़ाने के बाद भी पटना राजधानी को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाएगा या महज एक सपना बन कर ही रह जाएगा । 

कचरा प्रबंधन को लेकर स्वच्छता में पिछड़ा है भागलपुर स्मार्ट सिटी  

स्वच्छता में एक बार फिर भागलपुर पिछड़ गया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश के शहरों में कचरा प्रबंधन को लेकर सर्वे किया गया था। इसका रिजल्ट जारी किया गया। इस सर्वे में 1435 शहरों को शामिल किया गया था जिनमें 141 शहरों को स्टार रेटिंग दी गयी है। इस लिस्ट में भागलपुर का नाम नहीं है यानी अपना शहर स्वच्छता में पूरी तरह से पिछड़ गया है। 

कहने को तो यह शहर स्मार्ट सिटी है। पर नगर निगम ने इस पर कचरे की कालिख पोत दी है। जहां पाया वहां कूड़ा डंपिंग प्वाइंट बना डाला। आजतक कूड़ा निस्तारण की मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो पाई। लिहाजा, पूरा शहर कचरे के ढेर से पट गया है।

शहरों की बेहतर सफाई के लिए हर जगह सरकार स्वच्छता अभियान चला रही है। वहीं भागलपुर में नगर निगम कचरा बटोरने के बजाय फैलाने का काम कर रही है। शहर के प्रमुख विद्यालय मार्ग को भी कूड़े के ढेर में तब्दील कर दिया गया है।

एक तरफ जहां स्‍वचछता को लेकर देश के प्रधानमंत्री तक चिंतित है वहीं दूसरी तरफ लोग इस दिशा में संवेदनहीन होते जा रहे हैं। प्रशासन की व्‍यवस्‍था भी गंदगी को बढ़ाने का काम कर रहा है। लोगों को अपने घरों के सामने तक कूड़े के ढेर का सामना करना पड़ता है। नाक पर रूमाल रखे बिना आप इधर से गुजर नहीं सकते। 

भागलपुर ही नहीं, गंदगी और प्रदूषण के मोर्चे पर बिहार के कई शहर लिस्ट में सबसे ऊपर

बात करें अगर बिहार में वायु प्रदूषण की तो बिहार का मुजफ्फरपुर इस मामले में सबसे ऊपर है। बिहार के पटना और मुजफ्फरपुर में वायु प्रदूषण की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। राज्‍य के ये दोनों शहर देश के टॉप 10 प्रदूषित शहरों में शामिल हैं। हालांकि सरकार ने प्रदूषण की रोकथाम में लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। इसके अलावा रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने के मामलें में भी बिहार सबसे आगे है। रेल मंत्रालय की स्वच्छता के आधार पर की गई रैंकिंग में पटना जंक्शन, भागलपुर और पटना साहिब स्टेशन की स्थिति दयनीय बताई गई है। इनमें पटना जंक्शन और भागलपुर स्टेशन सबसे गंदे स्टेशन वाली सूची में शामिल हैं।

हालांकि इसमें उत्तर प्रदेश के कुछ स्टेशन भी शामिल है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? रेलवे स्टेशन की साफसफाई के लिए रेल मंत्रालय को विशेष ध्यान देना चाहिए। 

सरकार ने रैंकिंग के बाद अब इन स्टेशनों की बेहतरी के लिए क्या उपाय करने शुरू कर दिए हैं। इन स्टेशनों पर काम होना भी चाहिए क्योंकि बिना इस कवायद की रैंकिंग महज एक आंकड़ा बनकर रह जाएगा, जिसमें उतार-चढ़ाव होते रहेंगे, स्थिति कभी नहीं सुधरेगी।

हर क्षेत्र हर कार्य में पिछड़ने के बावजूद बिहार की कई राजनीतिक बयानों में ऐसा कहा जा रहा है कि बिहार के गांव केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी को टक्कर देंगे। ऐसे में यह भी एक सवाल उठता है की क्या ऐसे पिछड़ेपन के बावजूद बिहार के गांव केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी को टक्कर दे सकते है। 

स्मार्ट सिटी की सूची में ना होने के बाद अब जाहिर है बिहार सरकार की मंशा गावों को ही इतना संपन्न बना देने की है, की लोगों को शहर की जरूरत ही महसूस न हो।

इसके लिए सबसे पहले सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ बैंक व परिवहन जैसी सेवाओं से गांवों को जोड़ना होगा। मूलभूत सुविधाओं के मोर्चे पर सरकार ने विशेष तरीके से काम करना शुरू कर दिया है। जिसके तहत शिक्षण संस्थानों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। इसके अलावा बैंकों की सुविधा बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ने पहल की है।

इस पहल के तहत पांच हजार आबादी वाले चयनित सोलह सौ गांवों में विभिन्न बैंकों की शाखाएं खोलने का लक्ष्य रखा गया है। पीएचसी, रेफरल व सदर अस्पतालों की सुविधा चुस्त-दुरुस्त की जाएगी। इन सब के बाद अब यदि परिवहन की सेवा को विस्तार दे दिया जाए तो वाकई बिहार के गांव भी स्मार्ट विलेज बन सकते हैं। बात करें अगर संचार सुविधाओं की तो इस मामले में गांव पहले से ही स्मार्ट हो गए हैं। संचार सेवा से जुड़ी कई कंपनियां ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार ले चुकी हैं। यहां तक कि ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए सेवा प्रदाता कंपनियों के विकल्प भी उपलब्ध हैं। वे अपनी पसंद के अनुसार कनेक्शन ले सकते हैं। इस मामले में अब ग्रामीण आबादी भी बहुत स्मार्ट हो गई है। कहना गलत नहीं होगा कि गांव भी स्मार्ट हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें संसाधनों और सेवाओं से सुसज्जित किया जाए।

जरा सी बारिश में खुल जाती है स्मार्ट सिटी में व्यवस्था की पोल

भागलपुर के कई इलाकों में बारिश की हर बूंद यहां के निवासियों को डराती है। डर की वजह है हल्की बारिश में ही नाले का पानी उफनाकर घरों में घुस जाता है। जब पानी निकलता है तो कई बीमारियां छोड़ जाता है। दरअसल, सरकारी सिस्टम इलाके में फेल है। कोई देखने वाला नहीं है। अब हालात ये हैं की वहां चंदे के भरोसे नाले की सफाई से लेकर सड़क तक ठीक करने का काम चल रहा है, जबकि इलाके के लिए सरकार की सारी सुविधाएं कागज पर पूरी तरह से दुरुस्त हैं।

स्मार्ट सिटी के लिए बिहार में औद्योगीकरण होना है बेहद आवश्यक

बिहार में सबसे ज्यादा मानव संसाधन उपलब्ध है इसके बावजूद सरकार इन संसाधनों का उपयोग करने में असमर्थ रही है। बिहार की बहुत बड़ी आबादी नौकरी करने के बजाय बेरोजगारी झेलने के लिए मजबूर है। बिहार के युवाओ को रोजगार के तलाश में अक्सर दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। नौकरी की तलाश में लाखों युवाओ को अपने घर परिवार से दूर रहने पड़ता है। अगर बिहार में औद्योगीकरण होगा तो हज़ारो युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और उनके पलायन को रोका जा सकेगा। वर्त्तमान समय में बिहार में औद्योगीकरण की स्थिति बहुत खराब है और अगर सरकार इस और ध्यान नहीं देती है तो बेरोजगारी की समस्या कभी समाप्त नहीं होगी। 

निवेशको को आकर्षित करने के लिए GST और Tax पर रियायत करें 

बिहार में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार को निवेश के माहौल तैयार करना चाहिए। जिसके तहत सरकार को GST और टैक्स पर रियायत करना चाहिए। बिहार में अब कई बड़ी कंपनिया अपने उद्योग स्थापित करना का विचार कर रहीं हैं। बिहार की कृषि उत्पादन और सस्ते श्रमिक उन्हें बिहार में निवेश के लिए आकर्षित कर रहें हैं। ऐसे में अगर GST और Tax करों पर छूट मिलेगी तो इससे निवेशकों का बिहार के प्रति आकर्षण और बढ़ेगा और ज्यादा से ज्यादा उद्योग बिहार में स्थापित हो सकेंगे। 

बिहार में कैसे पूरा होगा स्मार्ट सिटी बनाने का सपना?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 100 स्मार्ट शहर बनाने की घोषणा की, तो आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने 100 स्मार्ट गांव बनाने का एलान कर दिया था। इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस सन्दर्भ में लालू यादव का समर्थन ही किया। नीतीश कुमार ने कहा की बिहार के स्मार्ट विलेज भारत के सभी स्मार्ट सिटी को टक्कर देंगे। अब समय आ गया है माननीय मुख्यमंत्री जी अपने इस कथन को सत्य करें। वर्तमान समय की आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार अपने वादे को पूरा करे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि गांवों को स्मार्ट कैसे बनाया जा सकता है?

सवाल इसलिए कि जब भी हमारे जेहन में गांव शब्द आता है, हम सुविधाविहीन जीवन की परिकल्पना करने लगते हैं। एक ऐसा जीवन जिसमें हर तरह की सुविधाओं से वंचित होने के बावजूद लोगों में अपनापन और जीने के प्रति उत्साह कायम है। लेकिन सवाल यह उठता है की बिहार में स्मार्ट विलेज बनेंगे कैसे ?

निश्चित तौर पर गांवों में सबसे बड़ी समस्याओं में बेरोजगारी है। यह बेरोजगारी इसलिए भी है क्योंकि आजादी के 68 वर्ष बीतने के बावजूद भूमि सुधार जमीन पर लागू नहीं हो सका है। आम तौर पर जब यह सवाल उठता है तब कई समाजवादी भी इसे ताम झाम का खेल बताकर छोड़ देते हैं। जबकि यह अटल सत्य है कि जबतक उत्पादन के संसाधनों पर वंचितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं होगी तबतक किसी भी प्रकार का विकास अधूरा माना जाएगा।

बिहार को स्मार्ट सिटी की आवश्यकता क्यों है?

रोजगार और बेहतर शिक्षा पाने के लिए हर साल बिहार से पलायन करना पड़ता है। साल 2017 की एक आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, रोजगार की तलाश में लगभग नौ मिलियन भारतीय हर साल शहरों की ओर पलायन करते हैं। जिसमें सबसे ज्यादा पलायन करने वाली आबादी बिहार की ही है। इतने बड़े पैमाने पर पलायन के कारण शहरों के संसाधनों और बुनियादी ढांचे पर बोझ पड़ा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है की 2050 तक, आधे से अधिक आबादी शहरों में रह रहे होंगे। गांवो तथा कस्बों से लोगों के पलायन को रोकने के लिए गांवों को बदलने और उन्हें शैक्षिक संस्थानों, स्वास्थ्य सुविधाओं, अपशिष्ट प्रबंधन, सड़के सहित आवश्यक सुविधाओं से लैस करने की आवश्यकता है, जिससे पलायन को रोका जा सके।

स्मार्ट सिटी से पहले स्मार्ट विलेज पर फोकस करे सरकार: नरेंद्र कुमार 

आत्मनिर्भर सेना तथा हिन्दराइज फाउंडेशन के संस्थापक श्री नरेंद्र कुमार जी का मानना है की सरकार को स्मार्ट सिटी से पहले स्मार्ट विलेज पर फोकस करना चाहिए। स्मार्ट विलेज के तहत सरकार को विशेषकर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार के क्षेत्र में विकास कार्य करने चाहिए। बिहार में उद्योग लगाकर बिहार में से बेरोजगारी समाप्त की जा सकती है इसके अलावा शिक्षा में बदलाव करके आने वाली पीढ़ी की नींव मजबूत की जा सकती है। 

स्मार्ट विलेज का मॉडल कैसा दिखेगा?

  • स्मार्ट विलेज में पूरी तरह से संचालित ग्राम पंचायत या स्थानीय सरकार होगी जो उस क्षेत्र के संपूर्ण विकास के लिए जिम्मेदार होगी।
  • यह विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को बेहतर जीवन स्तर प्रदान करेगी।
  • यह मौलिक अधिकारों के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, स्वच्छता सहित बेहतर बुनियादी सुविधाएं प्रदान करेगी।
  • यह गाँव खेती में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने और स्व-सहायता समूहों को इकठ्ठा करके स्थानीय व्यवसायों की सहायता के लिए तकनीकी नवाचारों का उपयोग करेगी।
  • यह निवासियों को सड़कों, ड्रेनेज सिस्टम, पार्को वगैरह जैसी बेहतर बुनियादी सुविधाएं प्रदान करेगी।

 स्मार्ट विलेज के लिए बुनियादी सुविधाएं

 स्मार्ट विलेज के लिए बुनियादी सुविधाएं
  • पर्याप्त पानी की आपूर्ति
  • निश्चित ऊर्जा आपूर्ति
  • रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक स्थानों की सफाई 
  • कचरा प्रबंधन सहित स्वच्छता
  • कुशल शहरी गतिशीलता और सार्वजनिक परिवहन
  • गरीबों के लिए किफायती आवास
  • बेहतर आई टी कनेक्टिविटी और डिजिटलीकरण
  • सुशासन यानी बेहतर शासन विशेष रूप से ई-गवर्नेंस और नागरिक भागीदारी
  • नागरिकों की सुरक्षा
  • स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र का विकास
  • पशु अस्पतालों का निर्माण 
  • रोजगार में वृद्धि 
  • स्वरोजगार को बढ़ावा 
  • नागरिकों का कौशल विकास

स्मार्ट विलेज मिशन रणनीति

क्षेत्र के आधार पर प्रगति के तीन मॉडल

  • रेट्रोफिटिंग
  • पुनर्विकास
  • हरितक्षेत्र

निष्कर्ष 

बिहार के सभी गांवों में भूमि सुधार लागू हो जाए। गांव के भूमिहीन लोग अपने खेत में फिरसे जोरोशोरों से काम शुरू कर दें। गांव के वो खेत जिन पर विवाद चल रहा है वे किसानों को वापस कर दी जाए। इसके अलावा वे लोग जो दिल्ली या मुंबई में हैं, लेकिन गांव की जमीन परती छोड़ देते हैं वे भी अपनी जमीनों पर वापस से खेती शुरू कर दें। गांवों की उत्पादकता को बढ़ावा दिया जाए। गांवों को शहर से जोड़ने वाली सड़क पक्की बनाई जाए। शिक्षकों को भी बेहतर सुविधाएं मुहैया कराइ जाएं जिससे उन्हें गांवों में जाकर पढाने में कोई परेशानी नहीं होगी। शहरों में वास करने वाले चिकित्सक भी गांवों में बने अस्पतालों में पूरे ऐशोआराम के साथ रहे और इलाज करें। ये सभी सुविधाएं गांवों में उपलब्ध होगी तभी बिहार को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना साकार किया जा सकेगा।  बहरहाल यह अभी महज कल्पना ही की जा सकती है। क्योंकि वर्तमान में जैसी व्यवस्था बिहार की है और  जिस गति में विकास के कार्य किए जा रहे हैं, उससे यहां के नौजवान केवल बेरोजगार ही बन सकते हैं या फ़िर दिल्ली, मुंबई व कोलकाता आदि शहरों में जाकर दिहाड़ी मजदूर का काम ही कर सकते हैं।

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