बिहार की शिक्षा नीति में लौटे नालंदा और तक्षशिला का दौर: नरेंद्र कुमार
| Updated: Oct 07, 2021 | Category: Blog

बिहार की शिक्षा नीति में लौटे नालंदा और तक्षशिला का दौर: नरेंद्र कुमार

देश की सबसे कठिन परीक्षा सिविल सर्विस परीक्षा भी सबसे ज्यादा बिहार के युवाओं ने ही पास की है। पिछले 20 सालों का रिकॉर्ड देखें तो बिहार से आईएएस अधिकारियों की संख्या में इजाफा हुआ है। पढ़ाई करने के लिए आपको वैसा माहौल चाहिए होता है लेकिन जब बात आईएएस बनने की हो तो क्या कहना। बिहार में छात्र सबसे ज्यादा मेहनती होती है इसमें कोई दो राय नहीं। बिहार की मिट्टी ने देश को सबसे ज्यादा आईएएस दिए हैं। हां समय समय पर कुछ नक़ल सम्बंधित घोटाले सामने आते हैं और बिहार की शिक्षा नीति पर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन ये हर जगह है। लेकिन यह भी सच है की देशभर में सबसे ज्यादा आईएएस और आईपीएस की सिविल सर्विस परीक्षा बिहार के युवाओं ने ही पास की है।

बिहार से आईएएस अधिकारी बनने के सबसे ज्यादा मामले 1987 से 1996 के बीच सामने आए थे। इस दौरान यूपीएससी के जरिए कुल 982 आईएएस अधिकारियों का चयन हुआ था, जिसमें से 159 अधिकारी सिर्फ बिहार की ही थे। उस समय बिहार से आईएएस बनने वाले युवाओं की दर 16.19 फीसदी थी। इन आकड़ों के साथ बिहारी छात्रों की सफलता ने पूरे देश को चौंकाया था। साल दर साल यह सिलसिला चलता रहा। बिहारी छात्र अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के कारण देश चलाने वाले ब्यूरोक्रेट में शामिल होते गए। 

बिहार की मिट्टी ने देश को दिए कई आईएएस अधिकारी 

बिहार सबसे ज्यादा आईएएस देने वाला राज्य है। यही नहीं आईएएस कैडर का हर दसवां आदमी बिहार का ही होता है। केवल आईएएस ही नहीं बल्कि सरकार में भी बिहारियों का ही बोलबाला है। केंद्र सरकार के हर आठवें सचिव बिहार कैडर के ही होते हैं। केवल मेहनत और प्रतिभा ही नहीं बल्कि सेहत व कदकाठी में भी बिहारी कैडर के अफसरों का ही दबदबा है। आपको बता दे की पिछले दस वर्षों में 125 आईएएस ऑफिसर केवल बिहार ने ही दिए हैं। जब सी-सैट लागू हुआ तो लोगों ने यह धारणा बना ली की अब सिविल सर्विसेज परीक्षाओं में बिहार के युवाओं की भागीदारी घटेगी लेकिन इन सभी धारणाओं को मिथ्या करते हुए यहां के युवाओं ने लगातार सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं में भाग भी लिया और अच्छी रैंक भी पाई। सी-सैट लागू होने के बाद लोगों ने अनुमान लगाना शुरू किया की अब बिहार से सिविल सर्विसेज पास करने वाले छात्रों की संख्या में कमी आएगी लेकिन सबको अचंभित करते हुए यहाँ के युवाओं ने अपनी बेजोड़ मेहनत और प्रतिभा से सिविल सर्विसेज में बिहार के छात्रों की सफलता के ग्राफ को साल दर साल बढ़ाया है। 

अभी हाल ही में बिहार के शुभम कुमार ने यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा में ऑल इंडिया 1st रैंक हासिल करके बिहार का नाम रोशन किया है। 

बिहार को ज्ञान की भूमि कहा जाता था  

एक समय था जब बिहार को ज्ञान की भूमि कहा जाता था कई देशों से छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे। बिहार से ही जन्मे बोध विचारों ने एशिया को ज्ञान और आध्यात्मिक रौशनी प्रदान की थी। बात करे अगर यहां के ज्ञान की तो ये वो भूमि है यहां कभी मिथिला की गार्गी जैसी स्त्री ने याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी को चुनौती दी थी। जहां आर्यभट्ट जैसे भारत के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ का जन्म हुआ था। आज उसी बिहार में स्थापित 33 विश्वविद्यालयो में एक भी ऐसा विश्वविद्यालय नहीं जो दुनिया क्या, भारत के सौ विश्वविद्यालयों में अपनी जगह बना सके। पटना विश्वविद्यालय और भागलपुर विश्वविद्यालय भी पहले अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रसिद्ध थे लेकिन धीरे धीरे इन्होने भी अपना गौरव खो दिया। पटना विश्वविद्यालय ने कई महान प्रतिभाओं को जन्म दिया है। बिहार के साइंस कॉलेज की पहचान हुआ करती थी। एक जमाने में यहां की प्रयोगशाला बेहद अत्याधुनिक हुआ करती थी लेकिन प्रशासन की लापरवाही के कारण आज एक भी उपकरण ऐसा नहीं जिससे शोध के नाम पर बच्चें कुछ सीख सकें। 

कई देशों से पढ़ने आते थे छात्र

प्राचीन भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केवल तीन ही विश्वविद्यालय थे, तक्षशिला, नालंदा औऱ विक्रमशिला थे। बिहार के इन प्राचीन विश्वविद्यालय की ख्याति दुनिया भर में फैली हुई थी। उस समय में कई परेशानियों और खतरों को झेलते हुए भी कई महीनों की यात्रा करके दूसरे देशों से छात्र यहां पहुंचते थे। तक्षशिला तो आज के पाकिस्तान में स्थित है लेकिन बाकी तो विश्वविद्यालय  नालंदा और विक्रमशिला आज भी बिहार में स्थित है और बिहार के गौरवशाली इतिहास को दर्शाते हैं। लेकिन सबसे दुख की बात ये है की इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद केंद्र सरकार की तरफ से एनआईआरएफ द्वारा देश के सौ बेहतर विश्वविद्यालयों की सूची में बिहार के एक भी कॉलेज का नाम शामिल नहीं है। यहां तक की अपनी सौ सालों की यात्रा पूरी करने वाले पटना विश्वविद्यालय का नाम भी इस सूची से बाहर था। 

गौरवमयी इतिहास  पुनः स्थापित करने के लिए नालंदा और विक्रशिला का दौर वापस लाना होगा। बिहार को पुनः ज्ञान की भूमि बनाने लिए शिक्षा की गुणवत्ता को होगा साथ ही टेक्नोलॉजी और व्यवसायिक आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। 

बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए नेताओं द्वारा किये गए कई वादें

अलग अलग सरकार ने बिहार में शिक्षा के स्तर में आयी गिरावट को ठीक करने का वादे किए थे लेकिन ये वादे कभी सच नहीं हो पाए। दुर्भाग्य से पिछले 15 सालों में राज्य के उच्च शिक्षा की स्थिति में और गिरावट ही आयी है। पटना विश्वविद्यालय और भागलपुर विश्वविद्यालय को छोड़ कर राज्य के किसी अन्य विश्वविद्यालय का सत्र भी नियमित नहीं हो पाया है। शिक्षकों की बहाली में भी सरकार सक्रियता नहीं दिखाती है। साल 2019 में शिक्षकों की भर्ती निकाली गई थी जिस पर शिक्षकों की बहाली अभी भी अटकी हुई है। युवा छात्र 2019 से अभी तक अपनी बहाली का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि पटना विश्वविद्यालय की हालत भी कुछ ख़ास नहीं है यहाँ भी हर विभाग में शिक्षकों की कमी है। 33 में से किसी भी विश्वविद्यालय में कक्षा नियमित तौर पर आयोजित नहीं की जाती। जहां की शिक्षा व्यवस्था देश की सबसे खराब शिक्षा व्यवस्था में गिनी जाती हो वहां डिजिटल बिहार और स्मार्ट बिहार की बात करना ही बेमानी है।

12वीं के बाद बेहतर शिक्षा की तलाश में छात्र करते हैं पलायन

बिहार में इंटर की परीक्षा पास करने के बाद छात्र उच्च शिक्षा पाने के लिए दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों की और पलायन करने लगते हैं। इन शहरों के संस्थानों की नजर अकसर बिहार के छात्रों पर रहती है जिनसे वे फीस के नाम पर अच्छी खासी मोटी रकम लेते हैं। छात्र जो वहां पढ़ने जाते हैं उन्हें वहां रहकर खाने, रहने से लेकर फीस तक में परिवार की पूरी माली हालत बिगड़ जाती है। 

पिछले कुछ सालों में बिहार के विभिन्न जिलों में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये हैं। लेकिन क्या केवल इमारतों की संख्या बढ़ाने से शिक्षा में सुधार होगा? यदि बिहार में शिक्षा की स्थिति को सुधारना है तो भवन निर्माण के साथ साथ गुणवत्ता वाली शिक्षा को भी बढ़ावा देना होगा। स्कूल और कॉलेज में योग्य शिक्षकों की बहाली करनी चाहिए जिससे छात्र अपने क्षेत्र में रहकर ही शिक्षा प्राप्त कर सकें।

सबसे बड़ी समस्या ये है की चुनावों के समय भी इन विश्वविद्यालयों के पुनःनिर्माण और देखरेख पर नेताओं का ध्यान नहीं जाता और ना ही जनता ऐसी समस्याओं और प्रश्नों को उठाना जरुरी समझती है। हमे यह समझना होगा की बिहार का विकास बिहार में रहकर ही किया जा सकता है पलायन करके नहीं। 

उच्च संस्थानों में एडमिशन दिलाने के नाम पर ठगे जाते हैं छात्र 

दिल्ली और चेन्नई के बड़े संस्थानों में एडमिशन के नाम पर बिहार के छात्रों को ठगा जाता है। ऐसे बहुत से ठग यहाँ के युवाओं पर अपनी गिद्ध दृस्टि बनाये रखते है और प्रसिद्ध कॉलेज में एडमिशन दिलाने के नाम पर इनसे लाखों रूपए ठगते हैं।  इसके अलावा कोचिंग, गैर सरकारी संस्थान, और पब्लिक स्कूलों के नाम पर भी यहां के छात्रों को ठगा जाता रहा है। 

दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन पाने वाले छात्रों की होड़ में सबसे बड़ी संख्या बिहार के छात्रों की ही होती है। इसके अलावा देश के ज्यादातर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में मुँह मांगी फीस देकर एडमिशन पाने वाले सबसे ज्यादा छात्र बिहार से ही आते हैं। 

बिहार की शिक्षा नीति में बदलाव की जरुरत है 

बिहार में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो हालात यहीं है की इंटर पास करने के बाद यहाँ के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बिहार से पलायन करना पड़ता है। हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा पाने के लिए बिहार छोड़कर बाहर शहरों में जाकर रहते हैं। फिर वही रोजगार पाकर उन्ही शहरों में परिवार सहित बस जाते हैं। राज्य में मेडिकल कॉलेजों की कमी के कारण छात्रों को बाहर पढ़ने जाना पड़ता है और फिर वहीं प्रैक्टिस करने लगते है और कभी बिहार नहीं लौटते। यदि बिहार में ही उच्च शिक्षा के संस्थान स्थापित किए जाएं तो यहां के युवाओं को कहीं बाहर नहीं जाना पड़ेगा और वे यहीं रहकर अपने राज्य के विकास में अपना योगदान दे पाएंगे। 

वैसे तो भारत के दस प्राचीन विश्वविद्यालय में से तीन विशविद्यालय बिहार में ही हैं लेकिन गुणवत्ता वाली शिक्षा के मामले में बिहार पिछड़ गया है। इसका नुकसान केवल छात्रों को ही नहीं बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था को भी होता है क्योंकि हर साल पलायन करने वाले छात्रों के रहने, खाने, पहनने और मूलभूत सुविधाओ पर होने वाला खर्च और सालाना फीस को मिलाकर 700 करोड़ होती है। इतनी बड़ी राशि हर साल बिहार से बाहर शहरों में जाती है। सरकार को बिहार की शिक्षा नीति में बहुत बदलाव करने की आवश्यकता है जिससे पलायन और इससे होने वाले आर्थिक नुकसान को रोका जा सके। 

बिहार में लगभग 33 विश्वविद्यालय स्थापित है लेकिन बावजूद इसके सरकार की NIRF की रैंकिंग में बिहार के एक भी कॉलेज का नाम शामिल नहीं है। बात करें अगर यहां के कॉलेजों के वर्तमान स्थिति की तो कुछ गिने चुने कॉलेजों में ही नियमित रूप से सत्र आयोजित किए जाते हैं। सरकारी संस्थानों के लैब में अक्सर उपकरणों की कमी देखी जाती है। कहीं पुस्तकालयों में किताबें भी उपलब्ध नहीं होती तो कही प्राचीन पुस्तकें अलमारी में पड़े पड़े धूल खा रहीं है। 

सरकार को इस तरफ सख्ती दिखानी चाहिए ताकि सभी कॉलेजों में नियमित रूप से सत्र शुरू हों। छात्रों के लिए भी 70 से 80 प्रतिशत तक अटेंडेंस अनिवार्य होना चाहिए साथ ही शिक्षको को भी कॉलेजों में नियमित रूप से उपस्थित होना चाहिए। कॉलेजों की इमारतों का पुनः निर्माण होना चाहिए। कॉलेज लैब असिस्टेंट और लाइब्रेरियन को यह सख्त हिदायत दी जाए की उनके लैब या लाइब्रेरी में जरुरी उपकरण और किताबों की देख रेख करें व आवश्यकता अनुसार छात्रों  लिए उपलब्ध भी कराएं। 

बिहार की शिक्षा में शोध और मौलिक ज्ञान को प्राथमिकता नहीं 

बिहार की शिक्षा प्रणाली में शोध और मौलिक ज्ञान तो प्राथमिकता की सूची से ही बाहर है। ज्ञान के नाम पर केवल घोटालें ही सामने आते है। बिहार में शिक्षा व्यवस्था बेहद दयनीय स्थिति में है। विकास के नाम पर केवल स्कूल की इमारते कड़ी करने से कुछ नहीं होगा यदि बदलाव लाना ही है तो सबसे पहले यहां की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना होगा। हर साल बच्चे स्कूल टॉप करते है फिर भी बेरोजगार है आखिर क्यों? शिक्षक अपनी मानदेय बढ़ाने और बहाली को लेकर धरना प्रदर्शन करते हैं लेकिन कोई क्यों यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाता? 

राजनीति और आरक्षण तो है लेकिन शिक्षा नहीं 

बिहार में राजनीति और आरक्षण तो है लें शिक्षा नहीं है। यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की बिहार में स्कूल नहीं बल्कि फर्जी टॉपर्स की फैक्ट्री चलाई जाती है। जहां अच्छी खासी रकम देकर आप बोर्ड परीक्षा में मनचाहा रैंक प्राप्त कर सकते हैं। जाहिर सी बात है यहाँ शिक्षा क्षेत्र में विकास के नाम पर केवल स्कूल की इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं लेकिन यहां की शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं जाता। 

बिहार में शिक्षा अब बस सरकारी नौकरी और मोटी पगार पाने का एक जरिया बनकर रह गया है। प्रशासन द्वारा फ़र्ज़ी डिग्री के आधार पर धड़ल्ले से अयोग्य शिक्षकों की बहाली की जाती है। ये शिक्षक साल भर बिना स्कूल में उपस्थित हुए अपनी पगार पाते रहते है। यदि यहां के युवाओं की बात करें तो अधिकतर युवा या तो सरकारी नौकरी के ख़्वाब देखते हैं या फिर राजनीति में अपना करियर बनाना चाहते हैं। जो छात्र इन सबसे हटकर कुछ नया करना चाहते है तो उन्हें योग्य शिक्षक नहीं मिल पाते। फिर ऐसे में शोध, बेहतर शिक्षा और वैज्ञानिक प्रयोग केवल कल्पना मात्र ही हैं। 

बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए केवल योग्य शिक्षकों की ही बहाली की जाए 

बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए का विकास करने के लिए सबसे पहले सरकार द्वारा एक जांच कमेटी का निर्माण होना चाहिए। यह जांच कमेटी समय समय पर नियुक्ति किए गए शिक्षकों के योग्यता की जांच करेगी। और यदि यदि वे योग्य नहीं पाए जाते तो उन्हें एक महीने का नोटिस दिया जाय ताकि वे स्वयं को योग्य साबित कर सकें। यदि इसके बाद भी वे योग्य साबित नहीं होते है तो उन्हें तुरंत बर्खास्त कर सके। इससे विद्यालयों में केवल योग्य शिक्षकों की नियुक्ति ही की जाएगी। साथ ही साथ यह कमेटी इस बात का भी पूरा ध्यान रखेगी की ये शिक्षक प्रतिदिन विद्यालयों में उपलब्ध रहते हैं या नहीं। और ये अपने काम में कोई लापरवाही तो नहीं करते आदि। 

इसके अलावा स्कूल प्रशासन को भी सख्त हिदायत दी जाए की वे हर महीने एक रिपोर्ट इस कमेटी को सौंपे जिसमे इन बच्चों की प्रगति विस्तार में बताई गई हो। इसी सम्बन्ध में इस कमेटी को यह भी छूट दी जाए की कभी भी यह कमेटी किसी भी स्कूल में जाकर वहां की शिक्षा व्यवस्था के बारे में तथा शिक्षकों के बारे में छात्रों से पूछताछ कर सकें। इन चरणों का पालन करके बहुत हद तक विद्यालयस्तर की बिहार की शिक्षा नीति में सुधार होगा। 

मातृभाषा के साथ साथ अंग्रेजी को भी पाठ्यक्रम में जगह दी जाए 

बिहार में कक्षा 6 से अंग्रेजी की पढ़ाई और 11 से कंप्यूटर पढ़ाया जाता है। बिहार में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती और जब तक अंग्रेजी पाठ्यक्रमों में शामिल होता है तब तक बच्चों के सिखने की उम्र निकल जाती है। जिसका परिणाम यह होता है की बाल्यकाल से अंग्रेजी न सिखने के कारण उनकी शिक्षा की बुनियाद मजबूत नहीं हो पाती और उनमें अक्सर साक्षात्कार के समय आत्मविश्वास की कमी देखी जा सकती है। मातृभाषा के साथ साथ अंग्रेजी की शिक्षा को भी पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए जिससे प्राथमिक शिक्षा से ही बच्चों की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ मजबूत हो सके। 

कुछ ऐसा ही हाल कंप्यूटर की शिक्षा का भी है। बिहार में 11वीं कक्षा में कंप्यूटर की पढ़ाई शुरू होती है। जबकि बेसिक कंप्यूटर की शिक्षा बच्चों के प्राथमिक पाठ्यक्रम में ही शामिल होनी चाहिए। एक तरफ तो हम डिजिटल बिहार का सपना देखते हैं वही दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था देश की सबसे खराब शिक्षा व्यवस्था में गिनी जाती है। 

रोजगार आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए 

आज के समय में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। पढ़े लिखे युवाओं को भी बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है जिसका मुख्य कारण है युवाओं में रोजगार आधारित कौशल की कमी और तकनीकी एवं रोजगार मूलक शिक्षा का ना होना है। क्योंकि हम भले ही कितनी भी बड़े डिग्री धारक क्यों ना हो जब तक हम रोजगार और व्यवसायों से संबंधित जानकारी नहीं होगी तब तक रोजगार पाना या व्यवसाय स्थापित करना बहुत मुश्किल होगा। यदि सरकार रोजगार मूलक शिक्षा पर ध्यान दे तो गांव-कस्बों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और युवा अपने कौशल के अनुसार रोजगार प्राप्त कर पायंगे। 

बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए युवाओं को तकनीकी शिक्षा दी जाए 

तकनीकी शिक्षा से युवाओं का कौशल विकास होता है साथ ही यह औद्योगिक उत्‍पादन को बढ़ाकर युवाओं के आजीविका में सुधार करके देश के आर्थिक व मानव संसाधन विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज के युवाओं को रोजगार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए तकनीकी शिक्षा देना बेहद जरुरी है। 

तकनीकी शिक्षा में इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट, वास्‍तुकला, नगर योजना, फार्मेसी, अनुप्रयुक्‍त कला के साथ साथ शिल्‍प कला, होटल मैनेजमेंट और केटरिंग प्रौद्योगिकी आदि शामिल होते हैं। तकनीकी शिक्षा पाकर बिहार के युवा सरकारी नौकरी के अलावा भी इन क्षेत्रों में अपना भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।  

डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए 

बिहार में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार को यहां ऑनलाइन फ्री क्लासेज, वेब सेमीनार और करियर काउंसिलिंग प्रोग्राम आयोजित करने चाहिए। जिससे छात्रों को सीखने में आसानी होगी और ऑनलाइन माध्यम से पढ़ने से उनका तकनिकी ज्ञान विकसित होगा साथ ही उन्हें करियर काउंसिलिंग की मदद से वे अपने लिए बेहतर करियर ऑप्शन भी चुन पायंगे। 

वेब सेमीनार और करियर काउंसिलिंग प्रोग्राम आयोजित करे सरकार 

कई बार जब बच्चे अपने 12वीं की परीक्षा पास कर लेते है तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है की अब आगे क्या चुने जिससे वे अपने भविष्य को बेहतर अकार दे सके। बड़े-बड़े शहरों के स्कूलों में छात्रों के इन्हीं सवालों के जवाब देने के लिए वेब सेमीनार और करीयर काउंसिलिंग की जाती है। इस तरह की काउंसिलिंग में विशेषज्ञों द्वारा बच्चों से उनकी रूचि पूछी जाती है और इसी के आधार पर उन्हें आगे अपने पाठ्यक्रम और करियर चुनने की सलाह दी जाती है। ये करियर काउंसिलिंग बच्चों के लिए बहुत मददगार साबित होती है। यह वेब सेमिनार और करियर प्रोग्राम इतने सारे पाठ्यक्रम और करियर ऑप्शन में से अपने लिए कुछ बेहतर चुनने की क्षमता प्रदान करती है। बिहार में इस तरह की सुविधाएं और मार्गदर्शन ना मिलने के कारण यहां के छात्र अपने लिए क्या सही है इसका आंकलन नहीं कर पाते और अक्सर वही करियर चुन लेते है जो उनके रिश्तेदारों द्वारा सुझाए जाते हैं। इस तरह के करियर काउंसिलिंग प्रोग्राम बिहार में आयोजित किये जाएंगे तो छात्र अपनी रूचि के अनुसार अपनी आगे की शिक्षा और पेशा चुन पायंगे। 

बिहार की शिक्षा नीति को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी को भी शामिल किया जाए  

टेक्नोलॉजी एक डिजिटल मंच के रूप में काम करती है जो मनुष्य की जरूरतों के अनुसार काम करती है। यदि हम शिक्षा में तकनीक को शामिल करें तो हमारे लिए सब कुछ बेहद आसान हो जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा हमारी आने वाली पीढ़ी को होगा। बदलते युग  के साथ सब कुछ टेक्नोलॉजी पर निर्भर होता जा रहा है। 

आज के ज़माने में टेक्नोलॉजी हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। अपनी घर की छोटी मोटी जरूरतों से लेकर देश के विकास तक हर जगह हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल देख सकते हैं। बड़े शहरों के स्कूलों में स्मार्ट क्लासेज आयोजित किये जाते है। जिससे बच्चों को सीखने में आसानी हो और वो बदलते समय के साथ आने वाली नई-नई टेक्नोलॉजी से अवगत हो सके। ये स्मार्ट क्लासेज टेक्नोलॉजी का एक सर्वोच्च उदाहरण है। 

टेक्नोलॉजी का प्रयोग शिक्षा को आसान बनाने के साथ साथ रोचक भी बनाता है जिससे बच्चों की रूचि पढ़ाई में बढ़ती है। किताबों से पढ़कर सीखने से ज्यादा बच्चें स्मार्ट क्लासेज से सीखते है जिसमें प्रैक्टिकल और वीडियो के माध्यम से साइंस और एक्सपरिमेंट जैसी चीजों के नमूने दिखाए जाते हैं ये बच्चों के दिमाग को भी विकसित करने में मदद करता है। 

इसके अलावा टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अक्सर ऑफिस में भी होता है आज के डोर में लगभग हर ऑफिस में टेक्नोलॉजी के माध्यम से काम किये जाते हैं सभी कंपनियां कंप्यूटर बेस्ड मशीनें ही रखती है। टेक्नोलॉजी के माध्यम से ना सिर्फ काम आसान  गलती और असफलता की दर भी बेहद काम होती है। 

प्रौढ़ शिक्षा को भी महत्व दिया जाए 

दुनिया रोज बदल रही डिजिटल होती जा रही है ऐसे में पुरानी पीढ़ी कही पीछे छूटती जा रही है। ये तो हम सभी ने सुना ही होगा की सिखने की कोई उम्र नहीं होती। इसी कथन को सत्य करने के लिए बिहार में प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से उन प्रौढ व्‍यक्तियों को जिन्हें अपने बाल्यकाल में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला और वे अपनी औपचारिक शिक्षा आयु को पार कर चुके हैं उन्हें शिक्षा प्रदान की जाएगी। प्रौढ़ व्यक्तियों को भी हमेशा साक्षरता, आधारभूत शिक्षा, कौशल विकास की आवश्यकता महसूस होती है। वे अपने आधा जीवन तो किसी तरह बिता चुके हैं लेकिन बदलते जमाने के साथ अब उन्हें कदम से कदम मिलाकर चलने में कठिनाई महसूस होती है। बिहार में प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देकर हम इस पीढ़ी के लिए भी कुछ बेहतर कर पाएंगे। 

शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बिहार सरकार की योजनाएं 

राज्य सरकार ने शिक्षा, कौशल विकास और बेहतर रोजगार-क्षमता के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से और बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए बिहार के युवाओं की क्षमता में सुधार करके आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं में शामिल हैं:

शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बिहार सरकार की योजनाएं
  • बिहार स्टुडेंट क्रेडिट कार्ड योजना
  • मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता योजना
  • कुशल युवा कार्यक्रम

युवाओं में टैलेंट की कमी नहीं, बस सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है 

बिहार के छात्रों में शिक्षा हासिल करने की अद्भुत ललक है। यहां के युवा बेहद प्रतिभाशाली होते हैं। बस कमी है तो बेहतर मार्गदर्शन की। रोजगार के क्षेत्र में लोवर रैंक से हायर रैंक तक बिहारियों की ही तादाद है। ऐसा कोई काम नहीं जिसमें बिहारी शामिल ना हो। अब सवाल ये उठता है की इतने टैलेंट होने के बावजूद यहां बेरोजगारी इतनी ज्यादा क्यों है ? तो इसका जवाब है- सही मार्गदर्शन की कमी, अक्सर ऐसा देखा जाता है की परिवार वाले अपने बच्चों को केवल यही सलाह देते है की इंटर की परीक्षा पूरी होते ही सरकारी नौकरी की तैयारी करो। परिवार वालों की सलाह मानकर या उनके दबाव में बच्चों सरकारी नौकरी की तैयारी में लग जाते है हालांकि सरकारी नौकरी के प्रति लगाव गलत नहीं है लेकिन अब लोगों को अपनी सोच बदलनी चाहिए। सरकारी नौकरी के अलावा और भी करियर ऑप्शन है जिन्हें चुनकर आप अपने भविष्य को एक बेहतर अकार दे सकते है। लोगों की सरकारी नौकरी वाली मानसिकता को बदलने के लिए ही सरकार को करियर काउंसिलिंग जैसे प्रोग्राम आयोजित करने चाहिए। इस काउंसिलिंग में छात्रों के साथ-साथ परिवार वालों को भी दूसरे करियर ऑप्शन के बारे में उनकी विशेषताओं के बारे में और इसके अलावा इससे होने वाले मुनाफे तथा सकारात्मक बदलाव के बारे में भी बताना चाहिए।

बिहार की शिक्षा नीति में बदलाव के लिए हिन्दराइज फाउंडेशन की पहल

हमारी संस्था हिन्दराइज फाउंडेशन द्वारा राज्य के अलग अलग जिलों में कौशल विकास कार्यक्रम तथा करियर संबंधित काउंसिलिंग आयोजित कराती है। इस काउन्सलिंग में हमारे विशेषज्ञ छात्रों को हर क्षेत्र के महत्व व उनसे भविष्य में होने वाले फायदों के बारे में जागरूक करते हैं। इसके अलावा हमारी टीम छात्रों के करियर संबंधित सभी प्रश्नों के उत्तर देती है और उन्हें सही मार्गदर्शन भी प्रदान करती है।

इसके साथ ही हम बिहार की शिक्षा नीति में सुधार लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और शिक्षा से जुड़े सभी जरुरी मुद्दे सरकार के सामने रखते हैं। 

बिहार की शिक्षा नीति में सुधार के लिए शिक्षा में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हमारी शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। टेक्नोलॉजी ना केवल छात्रों को अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करेगा, बल्कि इसके माध्यम से शिक्षा बेहद आसान हो जायेगी। टेक्नोलॉजी की शिक्षा के माध्यम से बच्चें हमेशा सीख सकते हैं। टेक्नोलॉजी बच्चों के दिमाग को तेज करके उनके विचारों को विकसित करेगी। इससे बच्चें सीखकर शोध व नवाचार के प्रति प्रेरित होते हैं। 

निष्कर्ष 

बिहार की शिक्षा नीति एक चिंतनीय विषय हो चला है। पूरे भारत में बिहार की शिक्षा-व्यवस्था को भ्रष्टाचार का पर्याय समझा जाने लगा है। एक तरफ जहां बिहार पहले नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान विश्वविद्यालय के लिए जाना जाता था। आज वह सिर्फ खराब शिक्षा व्यवस्था और घोटालों के लिए जाना जाता है। बिहार की गिरती शिक्षा व्यवस्था और लगातार प्रकाश में आते टॉपर्स घोटालों ने बिहार की छवि को बहुत खराब किया है। बिहार की शिक्षा नीति में सुधार लाने  के लिए नालंदा का दौर वापस लाना होगा।  बिहार में शिक्षा केवल किताबों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके ज्ञान को बढ़ाने और कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बदलते समय के साथ साथ शिक्षा में भी बदलाव लाना बहुत जरुरी है। शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी ज्ञान को बढ़ावा देकर छात्रों को कुछ नया और रोचक सीखने का मौका दिया जाना चाहिए।

Read our article:बिहार में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक

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