आत्मनिर्भर बिहार से पहले आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत पर विशेष ध्यान दे सरकार: नरेंद्र कुमार
| Updated: Sep 23, 2021 | Category: Blog

आत्मनिर्भर बिहार से पहले आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत पर विशेष ध्यान दे सरकार: नरेंद्र कुमार

किसी भी राज्य के विकास में वहां की सरकार के अलावा ग्राम पंचायत की भी अहम भूमिका होती है। हर राज्य के विकास के लिए बनने वाली समितियों में भी ग्राम पंचायत भी शामिल होते हैं, जो जरूरत के हिसाब से उस गांव के विकास की कार्ययोजना बनाने में भागीदार होते हैं। बिहार में यदि हम विकास चाहते हैं तो हमें आत्मनिर्भर बिहार से पहले आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत पर ध्यान देना होगा। क्योंकि बदलाव जब पंचायत स्तर से शुरू होंगे तभी पूरे राज्य का विकास संभव हो पायेगा।  

गांव के विकास के लिए बनने वाले समितियों में ग्राम पंचायत सदस्य भी होते हैं। इसीलिए आत्मनिर्भर बिहार से पहले यहां की पंचायतों का आत्मनिर्भर होना बहुत आवश्यक है। बिहार में पंचायत स्तर पर कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए पर्याप्त रणनीति बनाकर यहां रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत पंचायतों का मूल उद्देश्य ग्रामीण विकास के प्रयासों और जनता के बीच निरंतर संपर्क स्थापित करना है। अंततः ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्रो के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक सभी स्तरों पर विकास है। पंचायत इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पंचायतों को सौंपे गए कार्य ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहें हैं।  

इसके अलावा जिस मूलभूत संरचना की आवश्यकता सामाजिक और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में पड़ती है वह भी पंचायत ही है। राज्य में विकास के लिए आधार की ही नहीं बल्कि सहायक तत्वों की भी व्यवस्था पंचायत के माध्यम से ही की जाती है।

बिहार पंचायत राज अधिनियम के अनुसार ग्राम पंचायत के जो कार्य है उनमें पंचायत क्षेत्र के विकास के लिए वार्षिक योजना तैयार करना, पशुपालन डेयरी उद्योग, कूक्कट पालन, मत्स्य पालन, खादी, ग्राम, कुटीर उद्योग। इसके अलावा सड़क, भवन, पुलिया  निर्माण, जल मार्ग एवं संचार संसाधन आदि हैं। 

ग्राम पंचायत में क्या है समस्याएं ?

ग्राम पंचायत में क्या है समस्याएं ?

जातिवाद के आधार पर होता है विकास  

अगर उत्तर बिहार में विकास की बात करे तो पिछले तीस वर्षों में बिहार में जितनी भी राजनीति पार्टिया आई उन्होंने चुनाव केवल जातिवाद के आधार पर ही जीता। विभिन्न जाति के नेताओं ने सिर्फ अपनी जाति के लोगों का ही विकास किया। इसके अलावा यह कहना भी बिलकुल गलत नहीं होगा की बिहार में विकास केवल जातिवाद के आधार पर ही होता है। 

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत में जातिगत राजनीति समाप्त होनी चाहिए 

बिहार में कई राजनीति पार्टियां चुनाव जीतने के लिए अक्सर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाती है। इन राजनीति पार्टियों ने बिहार के लोगों को जातिवाद के नाम पर इस कदर बाँट दिया है की भविष्य में उनके बीच एकता की संभावना लगभग ना के बराबर है। बिहार में खेती कम हो जाने के कारण अब लोगो के पास खेती करने के लिए तीन महीने का ही समय होता है। इस अवधि के बाद लोगों के पास और कोई काम नहीं होता। खाली समय में ये लोग ऐसी ही गैर जरुरी चर्चा में लगे रहते हैं। ऐसे ही जातिवाद और सामाजिक तनाव के कारण बिहार में बहुत नरसंहार हुए हैं।

प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी भाषा और कंप्यूटर की शिक्षा को महत्व दिया जाए 

बिहार में कक्षा 6 से अंग्रेजी की पढ़ाई और 11 से कंप्यूटर पढ़ाया जाता है और हम सपना डिजिटल बिहार का देखते है। बिहार में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती और जब तक अंग्रेजी पाठ्यक्रमों में शामिल होता है तब तक बच्चों के सिखने की उम्र निकल जाती है। जिसका परिणाम यह होता है की बालयकाल से अंग्रेजी न सिखने के कारण उनकी शिक्षा की बुनियाद मजबूत नहीं हो पाती और उनमें अक्सर साक्षात्कार के समय आत्मविश्वास की कमी देखी जा सकती है। वही हाल कंप्यूटर की शिक्षा का भी है। बिहार में 11वीं कक्षा में कंप्यूटर की पढ़ाई शुरू होती है। जबकि बेसिक कंप्यूटर की शिक्षा बच्चों के प्राथमिक पाठ्यक्रम में ही शामिल होनी चाहिए। एक तरफ तो हम डिजिटल बिहार का सपना देखते हैं वही दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था देश की सबसे खराब शिक्षा व्यवस्था में गिनी जाती है। 

हालांकि यदि सरकार इन पाठ्यक्रम को प्राथमिक शिक्षा में प्राथमिकता दे भी दे तो सवाल यही उठता है की अंग्रेजी पढ़ायेगा कौन? क्योंकि अधिकतर शिक्षक अयोग्य है जो किसी भी स्कूल में बहाली के लायक ही नहीं। इसके अलावा सरकार भी शिक्षकों की बहाली में ख़ास तेजी नहीं दिखाती। 

  • रोजगार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए

आज के समय में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। पढ़े लिखे युवाओं को भी बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है जिसका मुख्य कारण है युवाओं में रोजगार आधारित कौशल की कमी और तकनीकी एवं रोजगार मूलक शिक्षा का ना होना है। क्योंकि हम भले ही कितनी भी बड़े डिग्री धारक क्यों ना हो जब तक हम रोजगार और व्यवसायों से संबंधित जानकारी नहीं होगी तब तक रोजगार पाना या व्यवसाय स्थापित करना बहुत मुश्किल होगा। यदि सरकार रोजगार मूलक शिक्षा पर ध्यान दे तो गांव-कस्बों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और युवा अपने कौशल के अनुसार रोजगार प्राप्त कर पायंगे। 

  • लड़कियों की शिक्षा को मिले बढ़ावा 

आज के समय में महिलाओं की स्थिति, विकास और उनके सशक्तीकरण का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद जिस तरह हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण, रोजगार के क्षेत्र में वृद्धि हो रही है, उसके मुकाबले महिलाओं की स्थिति उतनी संतोषजनक नहीं है। हालांकि कुछ समय से हमारे देश में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति में सुधार आया है, बावजूद इसके साक्षरता का दर आज नहीं पुरुषों की तुलना में काफी कम है।  महिलाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। सरकार लड़कियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान दे जिससे किसी भी अभिभावक को अपनी बेटियों को स्कूल और कॉलेज भेजने में दर ना लगे। साथ ही परिवार वालों को भी अब अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। उन्हें यह समझना चाहिए की बदलते जमाने के साथ महिलाएं भी पुरुषों के सामान हर कार्य में सक्षम है। उन्हें भी शिक्षा और रोजगार का अधिकार है। 

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के लिए आधुनिक कृषि को बढ़ावा दिया जाए

बिहार में आज भी कृषि अधिकतर परिवारों की आय का मुख्य साधन है। इसलिए कृषि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बिहार में परम्परागत कृषि के स्थान पर आधुनिक कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में फूड प्रोसेसिंग, मत्स्य पालन , डेयरी, पशुपालन और टैक्सटाइल डिजाइनिंग जैसे लघु व कुटीर उद्योगों को स्थापित किया जाना चाहिए।

कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योग लगाने से राज्य में रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी होगी। लघु उद्योग रोजगार पैदा करने के सबसे अच्छे साधन माने जाते हैं। इनके माध्यम से सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं। 

कृषि से होने वाली उपज और वन औषधियां व वनस्पतियों की उपलब्धता के आधार पर लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कृषि को बढ़ावा देने के लिए पंचायत में इससे संबंधित बजट का प्रावधान होना चाहिए। 

कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योग लगाए जाएं

बिहार में उद्योगों की कमी के कारण यहां के लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। बिहार में लोगों के रोजगार का प्रमुख साधन कृषि है। लगभग आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर ही निर्भर है। यहां की आबादी को पलायन से रोकने के लिए एक उपाय यह भी है की यहां कृषि संबंधित उद्योग स्थापित किए जाएं। कृषि उत्पादों का इस्तेमाल कच्चे माल के रूम में किया जाए और इसके लिए कृषि आधारित उद्योग बहुत आवश्यक है। 

कृषि उत्पादों का कच्चे माल के रूप में उपयोग करने के लिए कृषि पर आधारित उद्योगों एवं कारखानों को गांवों और कस्बों में स्थापित किया जाना चाहिए। इससे ना केवल रोजगार के नए अवसरों में वृद्धि होगी बल्कि लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति भी होगी।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के विकास के लिये कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के विकास के लिए ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिलना चाहिए। कुटीर उद्योग जैसे टिफिन बनाने का कुटीर व्यवसाय,अगरबत्ती बनाने का काम, नमकीन बनाने का उद्योग, बर्तन बनाने का उद्योग, साड़ी व कपड़ों का कुटीर व्यवसाय, रेस्टोरेंट व बेकरी कार्नर, मसाला बनाने का उद्योग, फर्नीचर बनाने का उद्योग आदि लगाने से लोगों में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और साथ ही समाज की एक बड़ी आबादी को रोजगार प्राप्त होंगे। महात्मा गांधी भी कुटीर उद्योगों स्थापित करने के पक्ष में थे। कुटीर उद्योग में समूहों का निर्माण कर ना केवल युवा बल्कि महिलाएं भी अपना रोजगार शुरू कर सकती है और अपनी आजीविका बेहतर तरीके से चलाकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के माध्यम से कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सकता है।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत में लघु उद्योग स्थापित किये जाएं

भारत जैसे विकासशील देश के आर्थिक विकास में लघु उद्योगों की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकार को गांव और कस्बों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए लघु उद्योगों और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना चाहिए। इससे ग्रामीण इलाको में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और बेरोजगारी की समस्या भी हल होगी। ऐसे उद्यमी जो ग्रामीण इलाको में अपना व्यवसाय स्थापित करना चाहते है, उन्हें सरकार द्वारा जमीन, बिजली और पानी रियायती दर पर मुहैया कराई जाए और साथ ही टैक्स और GST मुक्त किया जाए। इससे शहरों पर बढ़ता दबाव कम होगा और बिहार से लोगों का पलायन भी रोका जा सकेगा।

सही मार्गदर्शन और जागरूकता की आवश्यकता है 

बिहार में भी रोजगार स्थापना की संभावनाओं की कमी नहीं है, बस जरूरत है एक सही मार्गदर्शन और जागरूकता की। ग्रामीण इलाकों में कृषि व पशुपालन जैसे व्यवसाय में कुछ आवश्यक बदलाव लाकर युवाओं को इनकी तरफ आकर्षित किया जा सकता है। कृषि व पशुपालन जैसे व्यवसायों में सभी युवा अपने परिवार के साथ मिलकर काम कर सकते है और अपनी आजीविका बेहतर तरीके से चला सकते हैं। 

इसके अलावा सरकार द्वारा आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत स्तर पर लघु उद्योगों के संचालन संबंधित जागरूकता कार्यक्रम और ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किए जाए। जिसमें नए उद्यमियों को लघु उद्योग कैसे स्थापित करें और लंबे समय तक उसके संचालन आदि की संपूर्ण जानकारी दी जाए। 

इसके अलावा सरकारी और और निजी बिज़नेस यूनिट्स ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की जाएं। इन बिज़नेस यूनिट्स के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में रोजगार की अपार संभावनाएं उत्पन्न होंगी। 

गांवों को बनाया जाए आत्मनिर्भर

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। इसीलिए गांवों में आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत होना बहुत आवश्यक है। पिछले साल फैली महामारी के कारण बड़े पैमाने पर रोजगार संबंधित समस्याएं खड़ी हो गई थी। इस समस्या को दूर करने के लिए गांवों में खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, फल – सब्जी, अचार पापड़, बांस की वस्तु जैसे लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि महिलाओं की भी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। इन लघु उद्योगों से जुड़कर महिलाएं भी आत्मनिर्भर व सशक्त बन पाएंगी। गांवों में ही रोजगार उपलब्ध होने पर शहरों की ओर पलायन कम होगा तथा शहरी क्षेत्रों के सीमित संसाधनों पर दबाव भी कम होगा।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के विकास के क्रम मे स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाए

इस समय पूरा देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। इस परिस्थिति को देखते हुए सरकार ने ऐसी कई वित्तीय योजनाओं का एलान किया था जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति लोन लेकर अपना खुद का कोई भी लघु या मध्य व्यवसाय स्थापित कर सकता है। इससे न केवल देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इन लघु उद्योगों के माध्यम से रोजगार के अपार अवसर भी उत्पन्न होंगे। यदि आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत स्तर पर लघु व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाए, तो राज्य में व्यापक रूप से बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है।

जनसंख्या नियंत्रण की जरूरत

बिहार में में बढ़ती बेरोजगारी और अव्यवस्था का एक प्रमुख कारण बढ़ती जनसंख्या भी है। राज्य में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, रोजगार के अवसर उसी गति से कम होते जा रहे हैं। जनसँख्या के मामले में बिहार भारत में पहले नंबर पर आता है जाहिर है इतनी बड़ी आबादी को संभालने के लिए संसाधनों की भी आवश्यकता अधिक है। इसके अलावा जिस राज्य की जनसंख्या सबसे अधिक है विकास की अवस्य्क्ता भी उससे सबसे ज्यादा है। क्योंकि बिहार में रोजगार नहीं है जिस कारण यहां के लाखों लोगों को हर साल पलायन करना पड़ता है। परिवार बड़ा होने के कारण कृषि में भी समस्याएं आती है क्योंकि बटवारे के बाद सभी बच्चों के हिस्से जमीन के छोटे छोटे हिस्से ही आते हैं। ऐसे खेतों पर कृषि भी नहीं की जा सकती और इन्हे बेचना भी बहुत मुश्किल होता है। जिस कारण इन्हें भी मजबूरन कृषि छोड़नी पड़ती है। बढ़ती बेरोजगारी पर नियंत्रण पाने के लिए के लिए राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ाने के अलावा बढ़ती जनसंख्या को भी कम करने की आवश्यकता है।

हथकरघा और पारंपरिक उत्पादों को प्रोत्साहन दिया जाए

बिहार में हथकरघा और पारंपरिक उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए। महामारी के कारण पूरा देश प्रभावित हुआ है जिसमें असंगठित क्षेत्र की महिलाएं भी शामिल हैं। इन महिलाओं को उचित प्रशिक्षण देकर काम करने के लिए आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। महिलाएं घर पर बैठे ही हथकरघा और पारंपरिक उत्पादों के साथ साथ  मसाले भी तैयार कर सकती हैं। बिहार की बदहाल हो चुकी अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में कृषि भंडारण केंद्र, वेयरहाउस और खाद्य प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किए जाएं।

ऑर्गेनिक उत्पादों को बढ़ावा दिया जाए 

महामारी के दौरान लोगों को स्वास्थ्य जीवन का महत्व समझ आया और लोगों ने जैविक चीजों का इस्तेमाल काफी हद तक बढ़ा दिया है। महामारी के बाद लोगों में आयुर्वेदिक और जैविक चीजों की मांग काफी बढ़ गई है। देश में प्राकर्तिक और ऑर्गेनिक चीजों के उत्पादन बड़े स्तर पर किए जा रहे हैं। इस बढ़ती मांग के कारण इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना बढ़ गई है।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के लिये महिलाओं का कौशल विकास भी जरुरी 

राज्य की महिलाओं  लिए शिक्षा के साथ साथ उनका कौशल विकास होना भी आवश्यक है। सरकार को महिलाओं के लिए कौशल कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। जिसके तहत पंचायत स्तर पर लड़कियों के लिए विशेषकर कंप्यूटर कोर्स, सिलाई कोर्स आदि जैसे सभी कौशल ट्रेनिंग प्रदान की जाए। लड़कियों का कौशल विकास होगा तभी वे रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ पाएंगी। इसके अलावा वे महिलाएं जो नौकरी करने के बजाय स्वयं का कोई भी व्यवसाय स्थापित करना चाहती है। उन्हें व्यवसाय स्थापना के जरुरी तथ्यों से सम्बंधित ट्रेनिंग दी जाए। जिससे बिना किसी परेशानी के वे अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित कर के आत्मनिर्भर बन सकें। 

युवाओं का हो कौशल विकास 

महिलाओं के साथ साथ राज्य के बेरोजगार युवाओं के लिए भी सरकार को कौशल विकास कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए। जिसके तहत राज्य के सभी बेरोजगार युवाओं को निशुल्क कौशल विकास ट्रेनिंग (Skill Developemt Training) दी जानी चाहिए। इस ट्रेनिंग की अवधि पूरी होने के बाद युवाओं को उनके कौशल के आधार पर रोजगार मुहैया करना चाहिए। इस कौशल विकास ट्रेनिंग के बाद युवा अपने कौशल के आधार पर देश के किसी भी कोने में रोजगार प्राप्त कर सकेंगे। साथ ही ऐसे युवा जो नौकरी के बजाय स्वरोजगार स्थापित करना चाहते है उनके लिए भी यह ट्रेनिंग कार्यक्रम काफी मददगार साबित होगा और राज्य में बेरोजगारी की समस्या ख़त्म हो जाएगी। 

बेरोजगारों को ऋण दिया जाए

राज्य के बेरोजगारों को शून्य ब्याज दर पर लोन उपलब्ध कराया जाए, जिससे वे अपना स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकें। बेरोजगार युवा जो नौकरी की तलाश में पलायन करते है उन्हें सरकार की ओर से  शून्य ब्याज दर पर लोन दिया जाना चाहिए। जिससे वे रोजगार स्थापित करके अपनी आय सुनिश्चित कर सकें और देश की अर्थव्यवस्था में अपना सकें। 

बुनियादी सुविधाएं मजबूत की जाएं 

बुनियादी सुविधाओं के विकास में बिहार की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। बीते कुछ सालों में राज्य में बुनियादी स्तर पर विकास काफी हद तक हुआ है ख़ास कर सड़क, ऊर्जा और स्कूल निर्माण में काफ़ी काम हुआ है। 

इसके अलावा बिजली उपलब्धता में भी काफ़ी सुधार हुआ है, पर अभी भी राज्य में इसकी बहुत ही कमी है। लेकिन सरकार को अब सिंचाई, कचरा प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी जैसे ढांचागत विकासों पर भी ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक कृषि को प्रोत्साहन दिया जाए, जिससे किसानों और मजदूरों को भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा, जल प्रबंधन इत्यादि के माध्यम से कृषि भूमि क्षेत्र का विस्तार किया जाए, जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी साथ ही किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो बड़े बदलाव 

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद आईसीयू में सांसे ले रही हैं। एक आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार देशभर में सबसे खराब चिकित्सा व्यवस्था केवल बिहार (Hospital in Bihar) की है। भारत के सभी राज्यों में से सबसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधा वाले राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब हैं। जबकि सबसे ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं वाले राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।

बिहार सरकार ने अपने वित्तीय बजट 2021-2022 में चिकित्सा क्षेत्र के लिए रुपये 13,264 करोड़ का प्रावधान रखा है। इस बजट में से तक़रीबन 6,900 करोड़ रुपये विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाएंगे, जबकि 6,300 करोड़ रुपये का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में निर्माण कार्यों के लिए किया जाएगा।

इस बजट के अनुसार देखा जाय तो बिहार में चिकित्सा व्यवस्था (Hospital in Bihar) की मौजूदा स्थिति को सुधारने के लिए ये राशि बहुत कम है। और साथ ही इस बजट में बहुत से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी अनदेखा किया गया है, जिन्हें इस प्रस्तावित राशि की ज्यादा जरूरत है। इन क्षेत्रों में दवाओं की आपूर्ति, चिकित्सकों की भर्ती और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता शामिल है।

पशु अस्पताल की भी है आवश्यकता

गावों में अस्पतालों के साथ साथ पशु चिकित्सालय होना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि पशुपालन का व्यवसाय करने वाले किसानों को अपने पशुओं इलाज के लिए कई किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है। इससे न केवल किसानों को बल्कि पशुओं को भी बहुत परेशानी झेलनी पड़ती है। 

रोजगार के लिए बंद पड़े चीनी उद्योगों की पुनः स्थापना की जाए 

अतीत में बिहार औद्योगिक रूप से अन्य राज्यों की तुलना में काफी आगे था, लेकिन बिहार के बटवारे के बाद सभी प्रमुख उद्योगों ने झारखंड की और रुख कर लिया और बिहार औद्योगिकीकरण में पिछड़ता चला गया। बिहार में पहले चीनी उद्योग खुशहाली लेकर आई थी। बिहार में लगभग 28 चीनी मिल स्थापित की गयी थी। लेकिन अब गिनी चुनी चीनी मिल ही बिहार में बची है और वो भी लगभग बंद होने के कगार पर हैं। बिहार में उद्योगों के खस्ता हालात का पता इसी बात से चलता है की बिहार के लगभग 7 जिलों में एक भी उद्योग स्थापित नहीं किये गए हैं। 

बिहार की कृषि मौसम के अनुकूल यहां चीनी मिल काफी हद तक बढ़ा लेकिन कुछ समय पश्चात मजदूरों की कमी के कारण चीनी मिलों  ने महाराष्ट्र की और रुख कर लिया अब हालात ये है की बिहार से चीनी मिलों का अस्तित्व पूरी तरह से ख़त्म होने के कगार पर है। 

बिहार में आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के विकास के लिए बढाए जाए अनुदान  

विकास के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है और इसी की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा अनुदान दिया जाता है। हालांकि बिहार में अनुदान पहले से बढ़ा है लेकिन राज्य की वित्तीय स्थिति सुधरने के लिए बिहार सरकार को केंद्र सरकार से और उम्मीदें है। इसमें राज्य में  ना केवल विकास होगा बल्कि अनुदान से होने वाली आमदनी पर भी असर होगा। 

डिजिटल बिहार का हो निर्माण 

बिहार को डिजिटल बिहार बनाने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है जिसका परिणामस्वरूप  बिहार को वर्ष 2020 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा डिजिटल इंडिया अवॉर्ड 2020 से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान महामारी के दौरान सरकार द्वारा बिहार के लोगों को समय से राहत पहुंचाने के लिए प्रदान किया गया है। हालांकि बिहार भी अब डिजिटल बन रहा है और केंद्र सरकार की डिजिटल इंडिया मुहीम को आगे बढ़ा रहा है लेकिन अभी भी ऐसे कई मामलें सामने आ रहें है जिनसे यह जाहिर होता है की बिहार को डिजिटल बिहार बनने के लिए अभी काफी संघर्ष करना होगा। ऐसे कई मामलें सामने आए है जिसमें ऑनलाइन घोटाले, फ़र्ज़ी दस्तावेज और बिना वैक्सीन लगे ही लोगों के फ़ोन पर मैसेज आना और  सर्टिफिकेट भी जारी हो जाना जैसी बड़ी बड़ी ऑनलाइन चूक देखि गई है।  

बिहार सरकार अगर इन गलतियों में सुधार करे तो डिजिटल से पारदर्शिता आएगी, सेवाओं का आदान-प्रदान प्रभावी होगा और बिहार भी सुशासन की दिशा में कदम आगे बढ़ाएगा।

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के विकास के लिये लोन के लिए उपलब्ध हो वित्तीय संस्थाएं 

बिहार में ऐसे बहुत से युवा है जो अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित करना चाहते है लेकिन वित्तीय समस्याओं के कारण वे अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित नहीं कर पाते। किसी भी उद्यमी को व्यवसाय स्थापित करने के लिए लोन की आवश्यकता होती है लेकिन राज्य में वित्तीय संस्थान ना होने के कारण यहां के लोगों को लोन नहीं मिल पाता। इसके अलावा सरकारी बैंको का व्यवहार भी इनके प्रति अच्छा नहीं होता। इनसे लोन  आवेदन करने पर वर्षों बीत जाते हैं लेकिन लोन पास नहीं हो पाता और युवाओं का खुद का व्यवसाय स्थापित करने का सपना केवल सपना ही रह जाता है ऐसे में मजबूरन उन्हें कोई छोटी नौकरी करनी पड़ती है। सरकार को बिहार में वित्तीय संस्थानों को बढ़ावा देना चाहिए इसके अलावा सरकारी बैंकों में भी कामों में तेजी लाने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए। 

भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना जरूरी

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार योजनाएं तो लागू करती हैं, लेकिन ये योजनाएं ग्रामीणों तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं। इस वजह से इन योजनाओं का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाता है। इन योजनाओं की निगरानी के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे लोगों में सरकार के प्रति विश्वास पैदा हो। वर्तमान में हालात ये है की यदि सरकार किसी वित्तीय योजना का एलान करती है तो लोग पहले ही उसमें अपना कमिशन ढूंढने लगते हैं। जब लोग इन वित्तीय योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आवेदन करते है तो आधी से ज्यादा रकम अफसरों को चढ़ावे के रूप में जाती है और फिर जब बची हुई रकम लोगों तक पहुँचती है तब तक वह ऊँट के मुँह में जीरे के सामान रह जाती है। 

घर लौटे प्रवासी मजदूरों के लिए बैकअप प्लान तैयार रखे सरकार 

साल 2020 में लगे लॉकडाउन के कारण सभी कंपनियां बंद कर दी गई थी और बिहार के लाखों प्रवासी मजदूरों को वापस घर लौटना पड़ा था। इस दौरान राज्य सरकार के सामने कई समस्याएं खड़ी हो गई थी। इतनी बड़ी आबादी के सिमित समय में पूर्ण सुरक्षा के साथ उन्हें उनके घर पहुंचना। इसके अलावा इतनी बड़ी आबादी को एक साथ रोजगार मुहैया कराना भी एक बड़ी चुनौती थी। हालांकि जैसे तैसे  प्रवासी मजदुर अपने घरों को लौट गए लेकिन सरकार का दर लगातार बना हुआ था क्योंकि रोजगार के अलावा सबसे बड़ी चिंता का विषय यह भी था की शहरों और राज्यों से वापस लौटी इतनी बड़ी आबादी का प्रबंधन कैसे होगा। महामारी के दौरान सरकार द्वारा गाइडलाइन जारी की गई थी की जो भी व्यक्ति किसी भी दूसरे राज्य या देश से आता है तो उससे 14 दिनों तक कॉरेन्टाइन रहना पड़ेगा। अब समस्या यह थी की इतनी बड़ी आबादी को एक साथ कहां रखा जाए ताकि वे लोगों से दूर और सुरक्षित रह सकें। खैर वो समय भी लोगों ने बिता लिया फिर समस्या वहीं थी की आखिर कब तक प्रवासी मजदुर घर बैठकर अपना और अपने परिवार का लालन पालन कर सकेंगे। इसीलिए कुछ ही महीनों के बाद लोगों को वापस इन प्रदेशों की तरफ रुख करना पड़ा। 

सरकार को इस घटना से सिख लेनी चाहिए और भविष्य में आने वाले ऐसे किसी भी चुनौती के लिए पूर्णतः तैयार रहना चाहिए। 

आत्मनिर्भर बिहार के विकास में हिन्दराइज फाउंडेशन की भूमिका 

नरेंद्र कुमार जी अपनी संस्था हिन्द राइज फाउंडेशन के माध्यम से युवाओं के लिए निःशुल्क ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जिसके तहत युवाओं को उनके स्किल सेट के अनुसार ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग की अवधि पूरी होने के बाद इन युवाओं को उनके कौशल के आधार पर रोजगार मुहैया कराया जाता है। 

इसके अलावा नरेंद्र कुमार जी जिले में लघु उद्योगों के उत्थान के लिए भी निरंतर काम किया है। नरेंद्र कुमार जी की संस्था हिन्दराइज फउंडेशन के तहत युवाओं को लघु उद्योग स्थापना के लिए प्रेरित किया जाता है साथ ही उन्हें लघु उद्योग स्थापना के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। इस ट्रैनिग के अंतर्गत युवाओ को लिसेंसिंग, छोटे उद्योगों को कैसे संचालित करें, फंड कैसे मैनेज करें और साथ ही टैक्सेशन के प्रति जागरूक करती है। लघु उद्योग स्थापना में खर्च होने वाली लागत के लिए नरेंद्र कुमार जी की संस्था NBFC केंद्रों के साथ मिलकर काम ब्याज दर पर युवाओ को लोन भी मुहैया कराती है। 

निष्कर्ष 

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत के निर्माण एवं ग्रामीण इलाको में कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार को इन उद्यमियों को ऋण और सब्सिडी जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। सरकार की इस पहल से ना केवल इन समूहों को वित्तीय सहायता मिलेकि बल्कि समाज के सभी लोगों को प्रोत्साहन भी मिलेगा। अक्सर ऐसा देखा गया है की बेरोजगारी के कारण गरीब परिवारों को ना केवल आर्थिक समस्याएं झेलनी पड़ती है बलि युवाओं में भी बेरोजगार बैठने के कारण मानसिक तनाव साफ़ देखा जा सकता है ऐसे में यह सरकार का दायित्व बनता है कि उनको उचित रोजगार उपलब्ध करवाए और स्वरोजगार स्थापना में जहां तक हो सके उन्हें वित्तीय सहायता भी प्रदान करे। इसके अलावा सरकार को सरकारी बैंकों से इन उद्यमियों के लिए कम ब्याज दर पर लोन मुहैया कराना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। 

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी व निजी औद्योगिक इकाइयां लगाई जाएं, जिससे गांवों के लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हों और उनकी बेरोजगारी की समस्या ख़त्म हो। साथ ही डेयरी ,सब्जी और फल उत्पादन की ओर भी विशेष ध्यान दिया जाए।  शिक्षा के क्षेत्र में विकास के लिए तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। गांवों और कस्बों में बिजली, पानी, सड़क और इंटरनेट की व्यवस्था ठीक की जाए, जिससे लगातार होते पलायन को रोका जा सके। युवाओं को रोजगार देने के लिए उनकी क्षमता के आधार पर उन्हें कौशल विकास ट्रेनिंग देकर रोजगार से आसानी से जोड़ा जा सकता है।

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