देश की आज़ादी के बाद बिहार जहाँ पहले विकसित राज्यों में गिना जाता था वहीं आज पिछले पायदान पर पहुंच गया है। किसी भी राज्य में विकास की ईमारत निवेश, सस्ती ऊर्जा, स्मार्ट बैंकिंग सुविधा और दक्ष परिवहन प्रणाली पर आधारित होती है। बिहार को आज सिर्फ पिछड़ेपन और अविकसित राज्य के रूप में जाना जाता है। उत्तर बिहार में विकास की कमी क्यों है ये तो हम सभी जानते है लेकिन आज हम उन विशेष पहलुओं पर बात करेंगे, जिन्हें अमल में लाकर बिहार के हालातों में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।
उत्तर बिहार में विकास ना होने का सबसे मूल कारण है राज्य में उद्योगिकीकरण का ना होना। बिहार में उद्योग न होने के कारण हर साल बिहार के लाखों युवाओं को पलायन करना पड़ता है। यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा की पलायन अब बिहारियों की नियति बन गई है। पहले दादा बाबा कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों में रोजगार पाने के लिए बिहार छोड़कर जाते थे, लगभग वही स्थिति आज भी बानी हुई है। पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जा रहीं है लेकिन बिहार में रोजगार की व्यवस्था जस की तस है। आज भी वहां के युवाओं को रोजगार की तलाश में इन्हीं महानगरों का रुख करना पड़ता है। बिहार में विकास संभव है लेकिन सरकार को पहले इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेषकर ध्यान देना होगा।
बिहार के आर्थिक विकास के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि राज्य में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को बढ़ावा दिया जाए। उत्तर बिहार का कृषि के क्षेत्र में पिछड़ने का पहला और मुख्य कारण है बिहार में खेती की जमीन का छोटे छोटे हिस्सों में बटा होना। दरअसल, बिहार में अधिकांश भूमि पारिवारिक बटवारों के कारण छोटे छोटे हिस्सों में बाट दी जाती है। एक जमीन को कई भाइयों में छोटे छोटे हिस्सों में बराबर बाटा जाता है और इसी के परिणामस्वरूप ये जमीन खेती करने के लायक भी नहीं रह पाती। इन जमीनों पर खेती करना आसान नहीं होता साथ ही इस भूमि में खेती की लागत भी बहुत अधिक होती है। खास कर फसलों की सिंचाई पर खर्च बहुत बढ़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ जिन किसानों कि खेत बड़े होते हैं उनकी लागत कम आती है, और आमदनी ज्यादा होती है।
इसके अलावा बिहार में कृषि क्षेत्र में पिछड़ेपन का दूसरा मुख्य कारण है वहां की अधिकांश भूमि का विवादित होना। बिहार में ज्यादातर खेती की जमीन पर मुक़दमे लंबित होते है जिस कारण सरकार उनपर खेती करने से रोक लगा देती है। ये विवादित जमीने कहने के लिए तो खेती वाली जमीनों में गिनी जाती है लेकिन उनपर खेती नहीं की जाती। बिहार के अधिकतम मुकदमे कहीं ना कहीं भूमि से संबंधित ही होते हैं। अगर बिहार सरकार अभी भूमि संरक्षण और खेती पर ध्यान नहीं देती है तो बिहार विकास के दौड़ में काफी पीछे छूट जाएगा।
उत्तरी बिहार भाग हर साल बाढ़ की समस्या से पीड़ित रहता है। इसी कारण यहां खेती में कई तरह की चुनोतियो का सामना करना पड़ता है वहीं बिहार के दक्षिणी भाग में उत्तर के मुकाबले बारिश कम होती है। इसीलिए दक्षिणी भाग में बाढ़ का खतरा काम रहता है। लेकिन दक्षिणी भाग में खेती की सिंचाई के लिए अक्सर पानी की आवश्यकता होती है। यदि सिंचाई योजनाओं की बात करें तो सरकार अभी तक इन योजनाओं के माध्यम से कोई कमाल नहीं दिखा पाई है।
अंग्रेजों ने खेतों में सिंचाई सुविधा बढ़ाने हेतु “सोन नहर योजना” की शुरुआत की थी। बदलते समय के साथ इस योजना पर काम बंद कर दिया गया। इसके बाद सरकार ने सोन, गण्डक, बागमती, कोशी, उत्तरी कोयल, दुर्गावती आदि कई सिंचाई योजनाओं की शुरुआत की। लेकिन इनमे से दुर्गावती और उत्तरी कोयल नदी पर बनने वाली मण्डल सिंचाई योजना ने तो लगभग अपना अस्तित्व ही खो दिया है। अन्य योजनाओ के नहरों में तो गन्दगी जमने के कारण इनकी जल-ग्रहण क्षमता इन योजनाओं के पूरा होने के पहले ही दम तोड़ने लग गयी थी।

बिहार में विकास ना होने का एक मुख्य कारण शहरीकरण की कमी भी है। राज्य की केवल 11 प्रतिशत आबादी ही शहरों में रहती है। अधिकतम आबादी ग्रामीण इलाको में ही रहती है। इसके अलावा, बिहार में जो शहर हैं, वहां भी ढांचागत सुविधाएं और सेवाएं बहुत सराहनीय नहीं हैं। उन शहरों और क़स्बों का विकास भी कुछ ख़ास नहीं हो रहा है।
बिहार से लोगों के पलायन की वजह उद्योगों का ना होना और कम शहरीकरण का होना भी है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ करने और उद्योगिकीकरण की गति बढ़ाने से राज्य के विकास को बल मिलेगा। उत्तर बिहार में विकास के लिए यह ज़रूरी है कि यहां की मौजूदा शहरों मे ढांचागत सुविधाओं में सुधार किए जाए और वहां आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाई जाएं।
हालांकि ढांचागत सुविधाओं के विकास में बिहार की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। बीते कुछ सालों में राज्य में ढांचागत विकास काफी हद तक हुआ है ख़ास कर, सड़क और स्कूल निर्माण में काफ़ी काम हुआ है।
इसके अलावा बिजली उपलब्धता में भी काफ़ी सुधार हुआ है, पर अभी भी राज्य में इसकी बहुत ही कमी है। लेकिन सरकार को अब सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी जैसे ढांचागत विकासों पर भी ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है।
बिहार में सबसे ज्यादा मानव संसाधन उपलब्ध है इसके बावजूद सरकार इन संसाधनों का उपयोग करने में असमर्थ रही है। बिहार की बहुत बड़ी आबादी नौकरी करने के बजाय बेरोजगारी झेलने के लिए मजबूर है। बिहार के युवाओ को रोजगार के तलाश में अक्सर दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। अगर बिहार में औद्योगीकरण होगा तो हज़ारो युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और उनके पलायन को रोका जा सकेगा। वर्त्तमान समय में बिहार में औद्योगीकरण की स्थिति बहुत खराब है और अगर सरकार इस और ध्यान नहीं देती है तो बेरोजगारी की समस्या कभी समाप्त नहीं होगी।
उत्तर बिहार में विकास के लिए सरकार को प्रशासन में सुधार करने की आवश्यकता है। प्रशासन में सुधार करके मज़बूत संस्थानों के निर्माण की दिशा में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। विशेष रूप से सरकार को निचले अवसरों और पंचायत स्तर के कामो में सुधार करने की आवश्यकता है।
ऐसा कई बार देखा गया है की किसी भी सरकारी काम के लिए आम लोगों को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार कुछ जरुरी कार्यों के लिए सरकार की स्वीकृति लेना अनिवार्य होता है लेकिन सरकार की स्वीकृति पाने के लिए एक आम आदमी को सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर काटने पड़ते है। इससे उनके काम-धंधों पर भी प्रभाव पड़ता है। इस नियम को बदलने की आवश्यकता है और सरकारी कामों में तेजी लाने की आवश्यकता है।
बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता का पता इसी बात से चलता है की वहां के स्कूलों में 10वीं कक्षा तक अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती। अब 10वीं कक्षा तक अंग्रेजी विषय का पाठ्यक्रमों में अनिवार्य न होना कितना हानिकारक हो सकता है इसका अंदाज़ा लगा पाना भी बेहद कठिन है। यह तो केवल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना ही हैं।
बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने के लिए सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा की स्थिति बदलनी होगी। बिहार में प्राथमिक शिक्षा में सुधार करके ही बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। प्रारंभिक शिक्षा की नींव मज़बूत करने से ही बच्चे इंजीनियर, मेडिकल, आईएएस, आईपीएस, वैज्ञानिक आदि क्षेत्रों में अपना भविष्य बना सकेंगे।
इसके अलावा बिहार के शैक्षणिक संस्थान, खास कर के उच्च शिक्षा संस्थानों पर बहुत ही अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
बिहार के 16 बाढ़ प्रभावित ज़िलों के बीसियों गाँव बाढ़ के पानी में अक्सर डूब जाते हैं, सैकड़ों बेघर लोग तटबंधों और सड़कों पर रहने के लिए मजूबर हो जाते हैं और हज़ारों एकड़ में फैले उपजाऊ खेती पूरी तरह से जलसमाधि में लीन हो जाती है।
उत्तर बिहार में विकाश होना बहुत आवश्यक है। यहां हर साल आने वाली बाढ़ से करोड़ो की संपत्ति और संसाधनों का नुकसान होता है। बाढ़ के कारण जान माल के साथ लोगों के घर, स्कूल, सड़के तथा हॉस्पिटल पूरी तरह से बर्बाद हो जाते हैं। फिर इन संसाधनों के पुनःनिर्माण में फिर से करोड़ो का खर्चा आता है।
उत्तर बिहार में विकास के बुनियादी ढांचे सड़क, बिजली, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, संचार आदि का वहां निरंतर अभाव तो है ही, हर साल बाढ़ के बाद इनके पुनर्निर्माण के लिए अतिरिक्त धन राशि की चुनौतियां भी बनी रहती हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बिहार में बाढ़ से होने वाले जान-माल के नुक़सान को रोकने के लिए कोई दीर्घकालिक समाधान निकालना सम्भव है?
विकास के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है और इसी की पूर्ति के लिए, बिहार में अनुदान पहले से बढ़ा है। लेकिन राज्य की वित्तीय स्थिति सुधरने के लिए बिहार सरकार को केंद्र सरकार और उम्मीदें है।
इसमें राज्य में अनुदान से होने वाली आमदनी पर भी असर होगा।
बिहार पुनर्गठन अधिनियम-2000 में यह प्रावधान निर्धारित किया गया था कि विभाजन के बाद बिहार में होने वाली सभी वित्तीय समस्याओं को दूर करने में केंद्र सरकार बिहार सरकार की सहायता करेगी। जिसके तहत बिहार की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के सामने सिफारिश करने के लिए एक विशेष विभाग का गठन किया गया था।
लेकिन केवल कुछ ही सालों तक बिहार को इसका लाभ मिल पाया इसके बाद इसे बंद कर दिया गया। इसके अलावा योजना आयोग के द्वारा राष्ट्रीय सम विकास योजना के तहत विशेष अनुदान उपलब्ध कराया गया और बाद में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि के तहत भी बिहार को विशेष अनुदान उपलब्ध कराया गया था। लेकिन इसे भी कुछ समय बंद कर दिया गया। नीति आयोग को दोबारा इसे शुरू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अतीत में बिहार औद्योगिक रूप से अन्य राज्यों की तुलना में काफी आगे था, लेकिन बिहार के बटवारे के बाद सभी प्रमुख उद्योगों ने झारखंड की और रुख कर लिया और बिहार औद्योगिकीकरण में पिछड़ता चला गया। बिहार में पहले चीनी उद्योग खुशहाली लेकर आई थी। बिहार में लगभग 28 चीनी मिल स्थापित की गयी थी। लेकिन अब गिनी चुनी चीनी मिल ही बिहार में बची है और वो भी लगभग बंद होने के कगार पर हैं। बिहार में उद्योगों के खस्ता हालात का पता इसी बात से चलता है की बिहार के लगभग 7 जिलों में एक भी उद्योग स्थापित नहीं किये गए हैं।
बिहार की कृषि मौसम के अनुकूल यहां चीनी मिल काफी हद तक बढ़ा लेकिन कुछ समय पश्चात मजदूरों की कमी के कारण चीनी मिलों ने महाराष्ट्र की और रुख कर लिया अब हालात ये है की बिहार से चीनी मिलों का अस्तित्व पूरी तरह से ख़त्म होने के कगार पर है।
अगर उत्तर बिहार में विकास की बात करे तो पिछले तीस वर्षों में बिहार में जितनी भी राजनीति पार्टिया आई उन्होंने चुनाव केवल जातिवाद के आधार पर ही जीता। विभिन्न जाति के नेताओं ने सिर्फ अपनी जाति के लोगों का ही विकास किया। इसके अलावा यह कहना भी बिलकुल गलत नहीं होगा की बिहार में विकास केवल जातिवाद के आधार पर ही होता है।
बिहार में कई राजनीति पार्टियां चुनाव जितने के लिए अक्सर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाती है। इन राजनीति पार्टियों ने बिहार के लोगों को जातिवाद के नाम पर इस कदर बाँट दिया है की भविष्य में उनके बीच एकता की संभावना लगभग ना के बराबर है। बिहार में खेती कम हो जाने के कारण अब लोगो के पास खेती करने के लिए तीन महीने का ही समय होता है। इस अवधि के बाद लोगों के पास और कोई काम नहीं होता। खाली समय में ये लोग ऐसी ही गैर जरुरी चर्चा में लगे रहते हैं। ऐसे ही जातिवाद और सामाजिक तनाव के कारण बिहार में बहुत नरसंहार हुए हैं।
बिहार सरकार ने हाल ही में अपने कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता योजना बढ़ाने का एलान किया है। जिसके तहत सभी सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिया जाएगा जिससे उन्हें बढ़ती महंगाई के कारण परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या महंगाई केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए ही बढ़ी है? अगर महंगाई सबके लिए होती है तो महंगाई भत्ता सबके लिए क्यों नहीं।
यदि देखा जाए तो सरकारी कर्मचारियों को बेरोजगारी भत्ते की क्या आवश्यकता है। सरकारी नौकरी प्राप्त सभी लोगों की आय एक आम आदमी की आय से अधिक होती है। इसके अलावा सरकार अपने सरकारी कर्मचारियों तथा उनके परिवारवालों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सभी सुविधाएं अपनी और से उपलब्ध करवाती है। सरकारी कर्मचारियों को अलग से किसी भी प्रकार के खर्च की कोई आवश्यकता नहीं। सरकार को महंगाई भत्ता उन गरीब किसानों को देना चाहिए जो अक्सर बढ़ती महंगाई की मार झेलते है और हजारों के कर्ज के नीचे दबे रहते हैं।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद आईसीयू में सांसे ले रही हैं। एक आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार देशभर में सबसे खराब चिकित्सा व्यवस्था केवल बिहार (Hospital in Bihar) की है। भारत के सभी राज्यों में से सबसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधा वाले राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब हैं। जबकि सबसे ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं वाले राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं।
बिहार सरकार ने अपने वित्तीय बजट 2021-2022 में चिकित्सा क्षेत्र के लिए रुपये 13,264 करोड़ का प्रावधान रखा है। इस बजट में से तक़रीबन 6,900 करोड़ रुपये विभिन्न योजनाओं पर खर्च किए जाएंगे, जबकि 6,300 करोड़ रुपये का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में निर्माण कार्यों के लिए किया जाएगा।
इस बजट के अनुसार देखा जाय तो बिहार में चिकित्सा व्यवस्था (Hospital in Bihar) की मौजूदा स्थिति को सुधारने के लिए ये राशि बहुत कम है। और साथ ही इस बजट में बहुत से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी अनदेखा किया गया है, जिन्हें इस प्रस्तावित राशि की ज्यादा जरूरत है। इन क्षेत्रों में दवाओं की आपूर्ति, चिकित्सकों की भर्ती और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता शामिल है।
बिहार में सबसे ज्यादा मानव संसाधन उपलब्ध है इसके बावजूद सरकार इन संसाधनों का उपयोग करने में असमर्थ रही है। उत्तर बिहार में विकास तभी संभव है जब सरकार इन संसाधनों का सही इस्तेमाल करे। बिहार की बहुत बड़ी आबादी नौकरी करने के बजाय बेरोजगारी झेलने के लिए मजबूर है। बिहार के युवाओ को रोजगार के तलाश में अक्सर दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। नौकरी की तलाश में लाखों युवाओ को अपने घर परिवार से दूर रहने पड़ता है। अगर बिहार में औद्योगीकरण होगा तो हज़ारो युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और उनके पलायन को रोका जा सकेगा। वर्त्तमान समय में बिहार में औद्योगीकरण की स्थिति बहुत खराब है और अगर सरकार इस और ध्यान नहीं देती है तो बेरोजगारी की समस्या कभी समाप्त नहीं होगी।
उद्योगों की बदहाली का असर बिहार की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। बिहार में उद्योगों का इतिहास बहुत गौरवपूर्ण रहा है लेकिन विभाजन के बाद अधिकतर उद्योग झारखण्ड चले गए। जिसके परिणामस्वरूप बिहार में से उधोगिकीकरण पूरी तरह से समाप्त हो गया। इस परिस्थिति में बिहार को अपनी अर्थव्यवस्था सँभालने के लिए कृषि क्षेत्र का सहारा लेना पड़ा। लेकिन हजार कोशिशों के बावजूद सरकार की हर नीति और हर योजनाओं का कृषि के क्षेत्र पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।
जब उत्तर बिहार में विकास का स्तर बढ़ेगा तब देश-विदेश के सारे उद्योगपतियों का गन्तव्य बिहार ही होगा। अभी बिहार ने बिना किसी उद्योगिकीकरण और विशेष अनुदान के 15-16% का विकास दर प्राप्त किया है। ऐसे में अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त हो जाए तो यह संभव है की भविष्य में यह 100% की विकास दर भी प्राप्त कर ले। इस प्रकार की विकास दर के बाद बिहार विश्व भर में सभी के लिए एक उदाहरण बन के उभरेगा। निरंतर विकास से बिहार की जीडीपी तेजी से बढ़ेगी जिससे भारत की जीडीपी में भी इजाफा होगा।
आत्मनिर्भरसेना और हिन्दराइज सोशल वेलफेयर फाउंडेशन के संस्थापक श्री नरेंद्र कुमार जी ने उत्तर बिहार में विकास के लिए लगातार प्रयास किए हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब देश दवाइयों और टेस्ट की कमी से जूझ रहा था तब नरेंद्र कुमार जी और इनकी टीम ने कोरोना वॉर्रिएर बनकर लोगो की मदद की। इन्होने सीतामढ़ी जिले में पीड़ितों की सेवा के लिए कोरोना वॉर रूम तैयार करवाएं। जिले में दवाइयों की किल्लत को पूरा किया गया इसके अलावा इनकी टीम ने घर घर जाकर लोगो का निःशुल्क कोरोना टेस्ट करवाया।
नरेंद्र कुमार जी अपनी संस्था हिन्द राइज फाउंडेशन के माध्यम से युवाओं के लिए निःशुल्क ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जिसके तहत युवाओं को उनके स्किल सेट के अनुसार ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग की अवधि पूरी होने के बाद इन युवाओं को उनके कौशल के आधार पर रोजगार मुहैया कराया जाता है।
इसके अलावा नरेंद्र कुमार जी जिले में लघु उद्योगों के उत्थान के लिए भी निरंतर काम किया है। नरेंद्र कुमार जी की संस्था हिन्द राइज फउंडेशन के तहत युवाओं को लघु उद्योग स्थापना के लिए प्रेरित किया जाता है साथ ही उन्हें लघु उद्योग स्थापना के लिए ट्रेनिंग भी दी जाती है। इस ट्रैनिग के अंतर्गत युवाओ को लिसेंसिंग, छोटे उद्योगों को कैसे संचालित करें, फंड कैसे मैनेज करें और साथ ही टैक्सेशन के प्रति जागरूक करती है। लघु उद्योग स्थापना में खर्च होने वाली लागत के लिए नरेंद्र कुमार जी की संस्था NBFC केंद्रों के साथ मिलकर काम ब्याज दर पर युवाओ को लोन भी मुहैया कराती है।
उत्तर बिहार में विकास के लिए केंद्र सरकार को विकास और निवेश को बढ़ावा देना होगा। यह ना केवल बिहार के लिए बल्कि पूरे देश की आर्थिक विकास में काफी मददगार साबित होगा। हमारा मानना है की बिहार के दक्षिण भाग में काफी विकास हुआ है लेकिन अब बिहार के उत्तर भाग में विकास करने की बारी है। बिहार सरकार को बिहार के उत्तर भाग में भी विकास और निवेश के प्रति ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जिसके तहत सरकार को बिहार को विशेष अनुदान देने के साथ साथ इन जिलों में विकास के लिए विशेष अनुदान भी प्रदान करना चाहिए।
उत्तर बिहार के जिले जैसे सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आदि जिलों की समूचित आबादी अपनी जीविका के लिए सिंचाई के अभाव में मॉनसून और बाढ़ के बीच निम्न उत्पादकता वाली खेती पर ही निर्भर है। उत्तर बिहार के अधिकतर ग्रेजुएट युवा बेरोजगार है उन्हें रोजगार के वो अवसर प्राप्त नहीं हो पाते। वही दूसरी तरफ एक पहलु यह भी है की बिहार में बेहतर शिक्षा के अभाव में अधिकतर युवा किसी भी प्रकार की नौकरी के लिए अयोग्य साबित होते हैं। ऐसे में इन राज्यों में निवेश और शिक्षा के क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देकर ही इन परेशानियों से निजात पाई जा सकती है।